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रांझणा…


बीच बजार हीर को ढूँढे—सुर में पीर समाए,
हीर पुकारे—कहाँ चली तू, क्यों मुझको बीच में छोड़ जाए?
मन तरसे, नयन बरसें—भीगी पंखुड़ियों-सा संसार,
सूना काया, व्याकुल चित्त—कितना सहूँगा और इंतज़ार?

रांझणा…
बीच बजार हीर को ढूँढे—सुर में पीर समाए।

साँसों से साँसें उलझ रहीं—धड़कन हुई मदहोश,
होंठों पर थरथर स्पंदन—पर प्रीत अभी भी है ख़ामोश।
दो बूँद प्रेम की चाहत में—जीवन जैसे पिघला जाए,
हीर न दिखे तो खुदा भी जैसे रूह से दूर हो जाए।

रांझणा…
बीच बजार हीर को ढूँढे—सुर में पीर समाए।

जब हीर की याद सुबक उठी—नयनों में दीप जले,
तन में अगन, मन में मधुसी प्यास—पिघले रेशमी पल छले।
कदम बहकें, दिल धड़कें—प्रीत हुई क्यों बेक़रार?
हीर बिना हर साँस लगे—सूना, धूल भरा संसार।

रांझणा…
बीच बजार हीर को ढूँढे—सुर में पीर समाए।

आर एस लॉस्टम

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