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कविता

धर्म ध्वजा को धारण करके,
जग में बिगुल बजाया था।
धर्म सभा में जाय धर्म का,
सब को पाठ पढ़ाया था ।

दस मई को शिकागो में,
विश्व धर्म संसद कर वाया था ।
सारे धर्मों के मुखियाओं को,
प्रेम सहित बुलवाया था ।

सारे विद्वान,ज्ञान वान थे,
एक से एक बखानी थे ।
अपने धर्म को सारे जग में,
सर्वश्रेष्ठ बतलाते थे ।

संसद चला सारे दिन भर,
सब ने अपनी बात कही।
सबसे धर्म हमारा अच्छा,
ऐसी सुन्दर राह गई ।

जनता जाने लगी सभा से,
दिन भर की थी थकी हुई।
इसी समय में संचालक ने,
स्वामी जी को राह गई ।

छ:मिनट का समय तुम्हारा,
अपना धर्म बखानो तुम ।
कहा से आना हुआ स्वामी जी,
आज हमें बतलाओ तुम ।

स्वामी जी अब खड़े मंच पर,
एक टक सब को देख रहे ।
दूजे पल अपने श्रीमुख से,
सुंदर मीठे वचन कहे ।

प्रिय अमेरिकन बहनों भाई
धन्यवाद में कहता हूं ।
सारे धर्मों के मुखिया को,
आज नमस्कार करता हूं ।

सारे श्रोता सन्न रह गए,
सुनते मन न अगाता था।
सन्यासी की बातें सुनकर,
मन मस्त मगन हो जाता था।

मानवता का अर्थ बताकर,
सब से रिश्ता जोड़ा था।
जब भी बात खत्म करते थे,
गो बेक सदन चिल्लाता था।

सब धर्मों से श्रेष्ठ धर्म हैं,
हम सा नहीं जमाने में ।
हमने जग को ज्ञान दिया है,
धरती पर मानव बनाने में।

मानवता का पाठ पढ़ाया,
भला बुरा सब को समझाया ।
त्याग समर्पण की परिपाटी,
बहती है निर्मल सी धारा ।

रुको नहीं तुम अपने पथ पर ,
तुम को नित चलना होगा।
नए सफर में नए जोश से,
हर पल आगे बढ़ना होगा ।

में उस धरती से आया हूं,
जहां मानवता हर्षाती हैं ।
प्रेम भाव और अपने पन के,
गीतो की छटा सुहानी हैं ।

डॉ लाल सिंह किरार
अंबाह जिला मुरैना

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