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‘वंदे मातरम्’ के छह छंद अनिवार्य: सम्मान, एकरूपता और राष्ट्रीय चेतना का नया अध्याय

केंद्र सरकार द्वारा आधिकारिक कार्यक्रमों में ‘वंदे मातरम्’ के छह छंदों वाले संस्करण को अनिवार्य करने का निर्णय राष्ट्रीय जीवन में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। अब राष्ट्रीय ध्वज फहराने, राष्ट्रपति और राज्यपाल के आगमन, उनके संबोधनों से पहले और बाद में ‘वंदे मातरम्’ का निर्धारित 3 मिनट 10 सेकंड का संस्करण ही गाया या बजाया जाएगा। इस आदेश का उद्देश्य राष्ट्रीय गीत के सम्मान को बनाए रखते हुए उसकी प्रस्तुति में एकरूपता सुनिश्चित करना है।

‘वंदे मातरम्’ केवल एक गीत नहीं, बल्कि भारत की स्वतंत्रता संग्राम की आत्मा रहा है। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा 1875 में रचित यह गीत प्रारंभ में बंगाली पत्रिका ‘बंगदर्शन’ में प्रकाशित हुआ और बाद में उनके उपन्यास ‘आनंदमठ’ (1882) में स्थान पाया। अत्यधिक संस्कृतनिष्ठ भाषा में लिखे इस गीत ने मातृभूमि को एक करुणामयी, शक्तिशाली और पोषण करने वाली माँ के रूप में चित्रित किया। धीरे-धीरे यह गीत स्वतंत्रता आंदोलन का प्रेरक मंत्र बन गया—क्रांतिकारियों के होंठों पर, विद्यार्थियों के आंदोलनों में और जनसभाओं में इसकी गूंज सुनाई देती थी।

स्वतंत्र भारत ने ‘जन गण मन’ को राष्ट्रगान और ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रीय गीत का दर्जा दिया। संविधान सभा ने 24 जनवरी 1950 को यह स्पष्ट किया कि ‘वंदे मातरम्’ के पहले दो छंदों को राष्ट्रीय गीत के रूप में समान सम्मान प्राप्त होगा। अब छह छंदों के निर्धारित संस्करण को आधिकारिक कार्यक्रमों में शामिल करने का निर्णय, राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति गंभीरता और अनुशासन को दर्शाता है।

सरकार का तर्क है कि विभिन्न कार्यक्रमों में ‘वंदे मातरम्’ को अलग-अलग ढंग और अवधि में प्रस्तुत किया जाता था, जिससे प्रोटोकॉल में असमानता दिखती थी। नई व्यवस्था से समय-सीमा और प्रस्तुति दोनों में स्पष्टता आएगी। यह निर्णय राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान को औपचारिक रूप से सुदृढ़ करने की दिशा में एक प्रयास है।

हालाँकि, इस विषय पर विचार-विमर्श भी स्वाभाविक है। ‘वंदे मातरम्’ की भाषा संस्कृतनिष्ठ होने के कारण आमजन के लिए कठिन मानी जाती है। साथ ही, इसके कुछ छंदों में माँ भारती को दुर्गा के रूप में चित्रित किया गया है, जिस पर समय-समय पर विभिन्न समुदायों द्वारा आपत्तियाँ भी उठाई गई हैं। ऐसे में सरकार के इस निर्णय को संवेदनशीलता और समावेशिता के साथ लागू करना आवश्यक होगा, ताकि राष्ट्रीय एकता की भावना और अधिक सुदृढ़ हो।

वास्तव में, ‘वंदे मातरम्’ भारत की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत का अमूल्य हिस्सा है। यह गीत हमें हमारी मिट्टी, प्रकृति, संस्कृति और स्वतंत्रता संग्राम की याद दिलाता है। जब करोड़ों कंठ एक साथ “वंदे मातरम्” का उद्घोष करते हैं, तो वह केवल एक गीत नहीं रहता—वह राष्ट्र की आत्मा की अभिव्यक्ति बन जाता है।

सरकार का यह कदम यदि राष्ट्रीय सम्मान और एकता की भावना को प्रोत्साहित करने में सफल होता है, तो यह केवल एक प्रशासनिक आदेश नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना को सुदृढ़ करने वाला निर्णय सिद्ध होगा।

कृष्णा कान्त कपासिया

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