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काला दिन

दुनिया ज़श्न में डूबीं थी
मोहब्बत दिवस मनाने में जुटीं थी
क्या पता था मोहब्बत दिवस काला दिन बन जायेगा
यूं अचानक देश में मातम छा जायेगा
चला था क़ाफ़िया अपनी मंजिल की ओर
क्या पता था यूं मौत का तांडव मच जायेगा
चीथड़े चीथड़े उड़ गए थे ना आवाज निकली थी
हवा में बस धुआं था आग चारों ओर बरसी थी
कैसे बयां करें वो मंजर देख दिल रोया था
अस्थि विसर्जन को मिला ना शरीर लहूं हाथों से समेटा था
चालीस जवान हुए शहीद हर घर उदासी छाई थी
मन में भड़के थे शोले कसम यही खाई थी
40 का बदला 400 से लेंगे सर्जिकल स्ट्राइक कराई थी
चालीस जवान नहीं चालीस शेरों को मारा था
भारत मां के हर लाल ने बदले का बिगुल बजाया था
यूं कब तक गाल आगे कर चोटिल होते रहे
ईंट का जवाब मिलेगा पत्थर से अब ना चुप रहे
पुलवामा के हमले का तमाशा बनते देखा है
काला दिन भूल गये फिर से valentine मानते देखा है
खून बन गया है पानी शहीदों की सहादत याद नहीं
वेलेंटाइन डे याद है सबको पुलवामा का हमला याद नहीं

प्रिया काम्बोज प्रिया
सहारनपुर उत्तर प्रदेश

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