
“ रात की पेशी ”
मुखिया हरिचरण को पकड़कर जैसे ही लोग चौपाल से बाहर लेकर निकले,पूरा गाँव उसके पीछे-पीछे ऐसे चल पड़ा मानो सदियों के बोझ को उसके कंधों पर लादकर विदाई दे रहा हो।गंगाराम और रामशरण वहीं खड़े रहे।मिट्टी की नमी, कुएँ की ठंडक और हवा की थरथराहट –सबमें एक अजीब-सी शांति उतर आई थी,पर वह शांति अस्थायी थी,
मानो अगली आँधी आने से पहले की विराम-धुन।
रामशरण का प्रश्न
रामशरण ने धीमी आवाज़ में पूछा –
“गंगाराम, क्या अब आत्माएँ शांत होंगी?”गंगाराम कुछ देर चुप रहा।
फिर बोला –“एक आत्मा का बोझ हल्का हुआ है,पर गाँव की मिट्टी में जो अन्याय की गंध घुली है,वह इतनी आसानी से नहीं जाएगी।”उसकी आँखें कुएँ की गहराई में टिक गईं—मानो वहाँ किसी और आवाज़ की प्रतीक्षा हो।कुछ पल बीत गए… पर गोधन की आत्मा शांत थी।लेकिन वह शांति किसी नई कथा का संकेत दे रही थी।
पुराने कुएँ का रहस्य
गंगाराम धीरे-धीरे कुएँ की मुंडेर के पास गया।कुएँ के अंदर से अभी भी हवा का एक अजीब-सा कंपन उठ रहा था—जैसे कोई बीता हुआ समय खुद को बता देना चाहता हो।
रामशरण ने घबराकर पूछा—
“कुएँ में कोई और भी…?”
गंगाराम ने सिर हिलाया।
“गोधन अकेला नहीं था, रामशरण।
गाँव की याददाश्त छोटी हो सकती ह
पर मिट्टी कभी नहीं भूलती।
यह कुआँ सिर्फ पानी का कुंड नहीं…
यह वह गवाही है जिसमें सत्ता और जाति के नाम परकई आवाज़ें दफन की गई हैं।”रामशरण की रीढ़ में सिहरन दौड़ गई।गंगाराम फिर बोला—“आज एक कबूलनामा हुआ है,कल शायद और भी होंगे।इस मिट्टी के घाव एक व्यक्ति से नहीं भरे,पूरी पीढ़ी को बदलना पड़ेगा।”
गाँव की औरतों की आवाज़
उधर चौपाल की भीड़ में,
दो बूढ़ी औरतें आपस में फुसफुसा रही थीं।एक बोली—“बहुत दिन बाद किसी ने सच कहने की हिम्मत की…”दूसरी ने ठंडी साँस लेते हुए कहा—“हिम्मत नहीं बहिन…सच्चाई का समय लौट आया है।गंगाराम वैसा आदमी नहीं जो डर जाए।इसके भीतर किसी और का हौसला बोल रहा है।”उनका इशारा गंगाराम की उस यात्रा की तरफ था,जिससे वह मौत को मात देकर लौटा था।गाँव में लोगों ने सुना था—कि वह कुछ दिन तक मृत मान लिया गया था,पर अचानक एक सुबह जिंदा पाया गया,जैसे किसी अदृश्य शक्ति ने उसे वापस भेजा हो।
थाने की ओर यात्रा
हरिचरण को थाने ले जाते समय
उसके पैरों में इतनी कमजोरी थी
कि दो आदमी भी उसे सँभालते हुए लड़खड़ा रहे थे।
वह बार-बार कह रहा था—“मैंने अकेले नहीं किया…और लोग भी थे…मुझसे कहलवाया गया…मैं डर गया था…पर अब उसकी बातें सुनने वाला कोई नहीं था।थाने की दूरी भले एक कोस थी,पर उसकी चुप्पी पूरे गाँव तक फैल चुकी थी—कि अब राज की दीवारें टूटने वाली हैं।
गंगाराम की नज़रें दूर तक
गंगाराम ने आकाश की तरफ देखते हुए कहा—“गोधन, तू अकेला नहीं था…और न ही तेरी लड़ाई खत्म हुई है।”
पहली बार गाँव के लोग समझ पाए—
गंगाराम सिर्फ गोधन की आवाज़ नहीं,
बल्कि उन सभी असहाय आत्माओं की प्रतिध्वनि बन रहा था
जो कई वर्षों से इस गाँव की मिट्टी में रोती-बिलखती पड़ी थीं।
रामशरण ने गंगाराम के कंधे पर हाथ रखा—“आगे क्या होगा?”
गंगाराम ने लंबी साँस लेकर कहा—
“अब असली परतें खुलेंगी।
हरिचरण ने सिर्फ एक नाम लिया है—
उसके पीछे एक पूरा तंत्र है।
कल सुबह पंचायत होगी।
और मैं वहाँ वह सच बताऊँगा
जिसे लोग जानकर भी अनजान बने रहे।”उसकी आँखों में आग थी।
एक ऐसी आग जो बदले की नहीं,
न्याय की थी।
आर एस लॉस्टम












