
तस्यापि निरोधे सर्वनिरोधान्निर्बीजा: समाधि: ।
तस्य= उसका; अपि= भी; निरोधे= निरोध हो जाने पर; सर्वनिरोधात्= सबका निरोध हो जाने के कारण; निर्बीज निर्बीज; समाधि:= समाधि {हो जाती है} ।
अनुवाद– उसका भी निरोध हो जाने पर सबका निरोध हो जाने के कारण ‘निर्बीज समाधि’ हो जाती है ।
व्याख्या– इस प्रज्ञा से अन्य सब संस्कारों का, जो संसार में ले जाने वाले हैं उनका तो बाध हो जाता है, किन्तु नए संस्कार जो आत्मानन्द से संबंधित होते हैं विद्यमान रहते हैं । इसलिए इनका भी निरोध वैराग्य द्वारा किया जाने पर ‘निर्बीज समाधि’ सिद्ध होती है । इसमें वे बीज रूप संस्कार भी नष्ट हो जाते हैं । निर्बीज समाधि के प्राप्त हुए बिना कैवल्य प्राप्ति नहीं होती ।
यहाँ यह बात स्मरण रखनी चाहिए कि अविद्यादि संस्कारों के नष्ट होने से दुखों का तो अन्त हो जाता है, किन्तु विद्या आदि संस्कार भी संस्कार ही हैं । इनका भी निरोध होने पर कैवल्य प्राप्ति अथवा मुक्ति होती है इससे पूर्व नहीं । यह अन्तिम स्थिति है ।
इसके आगे कोई गति नहीं है । यही चैतन्य आत्मा अपने स्वरूप में स्थित हो जाती है ।
केवल बुरे का निरोध हो जाने पर साधक स्वर्ग का अधिकारी ही होता है ।
क्योंकि भोगों का बीज विद्यमान है, वासना शेष है, उसका मूल नष्ट नहीं हुआ है – केवल पक्ष बदला है बुरे से अच्छा । अच्छे का भी निरोध होने पर मोक्ष होता है ।
यही योग दर्शन का सार है जो जीव की अन्तिम अवस्था है ।
जहाँ से आया था वहीं पुनः पहुँच गया ।
प्रकृति से सदा के लिए सम्बन्ध छूट जाता है । तथा केवल चैतन्य ही शेष रह जाता है ।
ऋतम्भरा प्रज्ञा में साधक सत्य को तो उपलब्ध हो जाता है किन्तु मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकता ।
जिस प्रकार चोरों से घर की रक्षा करने के लिए पहरेदार रखे जाते हैं किंतु–
जब चोरों का भय दूर हो जाता है तो उन पहरेदारों को भी हटाना आवश्यक हो जाता है, और वरन् वे भी उपद्रव का कारण बन जाते हैं ।
इसी प्रकार सभी बुरे संस्कारों को ऋतंभरा प्रज्ञा जागृत होने पर दूर किया जा सकता है ।
किन्तु इसके बाद इसको भी हटाने पर ही मोक्ष प्राप्त होता है ।
अच्छे और बुरे सभी संस्कारों को हटा देना ही मोक्ष है ।
इस समाधिपाद की समाप्ति पतंजलि इसी अन्तिम अवस्था के साथ करते हैं जो जीव की अंतिम स्थिति है ।
इति समाधिपादः ।
स्रोत– पतंजलि योग सूत्र
लेखन एवं प्रेषण–
पं. बलराम शरण शुक्ल हरिद्वार












