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मानव मन में चलता अंतर्द्वद्व।।


ईर्ष्या, मोहे नित राह भटकाता,
करता अपने स्वार्थ की बात है।
त्याग,प्रेम उसे पथ दिखलाता,
उस पर चलना दुष्कर काज़ है।।

झूठ बोलकर काम निकालना,
हमें यह लगता आसान काम है।
भला फिर काहे सत्य के साथ चले,
हम काहे को कांटो की राह चुने।।

हम नित करूणा के साथ चलते,
निःस्वार्थ भाव से काम है करते।
हमारे समुख वो मधुर बोलते,
मन्नू वो पीठ पीछे छुरी चलाते है।।

कर्म का फल मिलता है सबको,
यह अटल निश्छल सत्य है।
वो लगाते पेड़ बबूल का है पर,
सदैव आम की चाह रखते है।।

हम सत्य, संस्कारो की राह चूने,
नित मर्यादा का हम मान रखे।
कर्म का फल चखना है हमको,
फिर काहे असत्य,फरेब के साथ चले।।

स्वरचित, मौलिक,अप्रकाशित है।
मुन्ना राम मेघवाल।
कोलिया, डीडवाना, राजस्थान।
Bhatimunnaram921@gmail.com

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