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मोक्ष के पथिक परछाइयों की वो रात

रामशरण ने पूछा, “तूने कुछ देखा क्या, गंगा?”
गंगाराम ने आँखें अँधेरे में टिका दीं। उसके चेहरे पर एक अजीब-सी ठंडक उतर आई थी। कुछ पल वो चुप रहा, जैसे सुनने की कोशिश कर रहा हो— आवाज़ें, कदमों के निशान, या फिर शायद… अपनी ही धड़कन।
फिर उसने कहा—“मैंने कुछ नहीं देखा, रामू…पर अनुभव किया है।”
रामशरण चौंक गया। “क्या मतलब?”
गंगाराम ने धीमे स्वर में कहा—“जब कोई व्यक्ति अचानक मर जाता है…
उसकी आत्मा कहीं न कहीं अटक जाती है।वो वापस आती है—लेकिन शरीर नहीं,सिर्फ पीड़ा लेकर।”
आँगन में सन्नाटा छा गया।
बूढ़ी औरत बुदबुदाई— “क्या मेरे पति की आत्मा मुझे ढूँढ रही है?”
गंगाराम ने पलटकर उसकी ओर देखा। “नहीं दाई… वो परछाई आपके पति नहीं थे।
वो थे… आपके भीतर के सवाल।”
लोगों ने एक-दूसरे की ओर देखा। कुछ समझे, कुछ और उलझ गए।
रामशरण ने धीमे से कहा— “गंगा, तू मरकर लौटा है…
पर ये परछाइयाँ कैसे लौटती हैं?”
गंगाराम की आँखें रात में और गहरी हो गईं। उसने मानो अपने भीतर से शब्द निकालकर कहा—
“मरने के बाद देह नहीं भटकती,
पछतावे भटकते हैं।
जहाँ दर्द अधूरा होता है,
वहाँ परछाइयाँ लौट आती हैं।”

एक जवान लड़का बोला— “तो क्या… दाई के पति भी कुछ अधूरा छोड़ गए थे?”
गंगाराम ने सिर हिलाया— “हर मौत अधूरी रहती है।
बस फर्क इतना है कि
कुछ अधूरापन घर तक आ जाता है,
कुछ मन तक।”
रामशरण ने बात काटी— “लेकिन दाई ने तो कहा कि उसने उन्हें देखा—
साफ–साफ!” गंगाराम धीरे से मुस्कुराया। “भूख, डर, अकेलापन—
ये तीनों मिलकरमृतकों की शक्लें बना देते हैं, रामू।”

अच्छानक हवा तेज हुई। बरगद की सूखी पत्तियाँ आँगन में गिरने लगीं। लालटेन की लौ काँप उठी।
गंगाराम ने आकाश की ओर देखा— “आज रात कई जगहों पर परछाइयाँ उठेंगी। गाँव चैन से नहीं सोएगा।”
बूढ़ी औरत रोने लगी— “तो क्या कोई अपशकुन है?”
गंगाराम की आवाज़ में एक अजीब सा यथार्थ था— “अपशकुन तब होता है जब इंसान अपने पाप से भागे।
और ये गाँव…लंबे समय से भाग रहा है।” लोगों ने एक-दूसरे को देखा—
कभी जाति की हिंसा, कभी बदले की आग, कभी झूठे इल्ज़ाम—यह गाँव सच में बहुत कुछ दबाए बैठा था।
रामशरण ने गहरी सांस ली— “तो क्या अब ये सब बाहर आएगा?”
गंगाराम ने उत्तर दिया—“हाँ, रामू।
इस गाँव की आत्मा जाग गई है।जो दबा हुआ दर्द था…वो लौटकर आएगा। हर गलत फैसला,
हर दंगा,हर अन्याय—परछाई बनकर सामने खड़ा होगा।” और तभी— दूर पहाड़ी की ओर से
एक लंबी, अजीब, कराहती हुई आवाज़ गूँजी।

लोग काँप उठे। बूढ़ी औरत ने मुँह ढक लिया। रामशरण के रोंगटे खड़े हो गए।
गंगाराम ने फुसफुसाया—“शुरुआत हो गई है, रामू…यह गाँव अब सच से नहीं बच पाएगा।”अंधेरा और गहरा हो गया। और उस अंधेरे मेंbकिसी ने जैसे
एक लंबे अधूरे इतिहास का दरवाज़ा खोल दिया।

आर एस लॉस्टम

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