
धन केवल सुख-विलास नहीं, यह है सेवा का संस्कार,
धर्म, करुणा और लोकहित में, इसका हो सदुपयोग सार।
धन को लक्ष्मी कहा गया है, जब वह सही दिशा में लगती,
लक्ष्मीपति प्रसन्न हों तब, जीवन में सुख-शांति जगती।
पहला यज्ञ — दान का दीपक, दीन-दुखी की आस,
अनाथ, निर्धन, भूखे मन को, देता जीवन-विश्वास।
अन्नपूर्णा मुस्काती हैं, जब करुणा बनती अन्न,
ऐसा धन ही पवित्रतम है, ऐसा भाव ही धन्य।
दूसरा यज्ञ— धर्म और यज्ञ, पूजा-हवन, गौ-सेवा,
मंदिर, संस्कार, भक्तिभाव में, मिले ईश्वर की मेवा।
नारायण प्रसन्न हो उठें, जब निधि धर्म में लगे,
धन का सौभाग्य तभी है, जब वह सत्य में जगे।
तीसरा यज्ञ— अतिथि सत्कार, संत-पुरुष का मान,
यात्री, साधु, अतिथिगण हैं, ईश्वर का ही दान।
अग्निदेव आशीष देते, जब थाली प्रेम से भरे,
अभिमान नहीं, विनम्रता से, अतिथि का आदर धरे।
चौथा यज्ञ— कुल-रक्षण धर्म, शिक्षा, सेवा, पालन,
वृद्ध, बाल, परिवार हेतु, कर्तव्य का हो अर्पण।
जब गृहस्थ धर्म निभे सच्चा, कुबेर स्वयं मुस्काएँ,
ऐसा घर सुख-लक्ष्मी पायें, जहाँ कर्तव्य निभ जाएँ।
पाँचवाँ यज्ञ— संस्कृति सेवा, राष्ट्रभक्ति की शान,
साहित्य, विद्यालय, जल-वन, गो-सेवा महान।
इंद्र और पृथ्वी प्रसन्न हों, जब संस्कृति हो संरक्षित,
धन तभी यज्ञ बन जाता है, जब समाज पर हो समर्पित।
जब धन लगे सनातन ग्रंथों में, संस्कृति का करे प्रचार,
तब विष्णु स्वयं प्रसन्न हों, मिलती है लक्ष्मी अति अपार।
यदि धन व्यर्थ अपव्यय में हो, अहंकार में होता है नष्ट,
तो वह न टिकता जीवन में, देता है दुःख और कष्ट।
इसलिए हे मनुज! विचार करो, धन का सही मार्ग में दो,
धर्म, सेवा, साहित्य और संस्कृति में इसे दान रूप में दो।
जब भी धन सनातन साहित्य की सेवा में खर्च होता है,
तब वह केवल साधन नहीं — साधना बन जाता है।
योगेश गहतोड़ी “यश”
नई दिल्ली – 110059












