
पहाड़ी से उठी वह कराहती आवाज़ जैसे पूरी रात को चीरती हुई गाँव के ऊपर आकर ठहर गई। लोगों ने एक-दूसरे की ओर देखा—कुछ ने डर छुपा लिया, कुछ ने मान लिया कि अब वही होने वाला है, जिससे बरसों से सब भागते आए थे। रामशरण ने काँपते स्वर में पूछा—
“ये किसकी आवाज़ थी, गंगा?”
गंगाराम कुछ देर शांत रहा। उसकी आँखें मानो उस अंधेरे को पढ़ रही थीं, जिसमें गाँव के अपराध, पाप और अधूरे इतिहास धुँधली आकृतियों की तरह तैर रहे थे।
फिर उसने कहा—
“ये आवाज़ किसी व्यक्ति की नहीं थी, रामू।ये थी…इस गाँव की दबाई हुई चीख।” कुछ लोग सिहर उठे। एक बच्चा बिलख पड़ा, उसकी माँ ने उसे सीने से लगा लिया।
बरगद के नीचे की चुप्पी
गंगाराम धीरे-धीरे बरगद के पेड़ की ओर बढ़ा। बाकी लोग भी उसके पीछे चल पड़े, जैसे कोई अनकहा भय उन्हें घसीट रहा हो। बरगद के नीचे पहुँचकर उसने मिट्टी की ओर देखा—
मानो उस मिट्टी से बात कर रहा हो।
“इस धरती ने बहुत कुछ देखा है,” उसने कहा— “गुपचुप दफन की गई चीखें…बेआवाज़ रातें…और वो लोग,
जिन्हें कोई नाम तक नहीं देता।”
एक बूढ़ा आदमी बोला—“गंगा, तू साफ़–साफ़ क्यों नहीं बोलता?
क्या होने वाला है?”गंगाराम ने बूढ़े की ओर देखा। उसकी आवाज़ में न क्रोध था, न डर—सिर्फ सच्चाई का बोझ।
“आज रात,” उसने कहा,
“गाँव का वो अतीत जागने वाला है
जिसे तुम सबने धकेलकर
बरगद की जड़ों में दबा दिया था।”
रात में जलता हुआ कोठा
अचानक दूर खेतों की तरफ़ से
टिमटिमाती रोशनी उभरी—
एक झोंपड़ी में आग लगी थी।
औरतें चिल्लाईं— “हे भगवान! ये कैसे आग लग गई?”
रामशरण भागने को हुआ, पर गंगाराम ने उसका हाथ पकड़ लिया—“रुक रामू…अभी कोई आग बुझाने मत जाना।”“क्यों?” रामशरण घबरा गया।
गंगाराम ने शांत स्वर में कहा—
“वो आग कोठे की लकड़ी जलाकर नहीं लगी है…वो किसी की याद
गुस्से की तरह भड़क उठी है।”
झोंपड़ी की आग और तेज हुई।
कुछ लोग भागने की सोचने लगे, पर पैर वहीं जमे रहे। बूढ़ी औरत, जो पहले अपने पति की परछाई देखने की बात कर रही थी, डरी हुई आवाज़ में बोली—“गंगा बेटा… क्या ये हमारे पापों का बदला है?” गंगाराम ने कहा—“नहीं दाई, बदला नहीं…ये दर्पण है।
गाँव का हर अन्याय आज
अपना चेहरा दिखाएगा।”
चौराहे पर जमा हुआ झुंड
कुछ देर बाद सभी लोग चौराहे पर जा पहुँचे।आकाश में बादल घिर आए थे।
हवा में राख, डर और किसी अजीब-सी उम्मीद का स्वाद घुला था।
गंगाराम ने कहा—“तुम लोग सोचते हो कि सिर्फ मृतक लौटते हैं?
नहीं…कहानी भी लौटती है।
वो कहानी जिसे तुमने दबाया,
भुलाया,या जिस पर झूठ के ओढ़ने डाल दिए।”एक किशोर लड़का हिम्मत कर बोला—“गंगा, क्या आज कोई मरने वाला है?”गाँव सन्नाटे में डूब गया। गंगाराम ने उसका सिर सहलाया—“नहीं…आज कोई नहीं मरेगा। पर कई लोग अपनी झूठी ज़िंदगियाँ खो देंगे।” रामशरण समझ नहीं पाया—
“क्या मतलब?” गंगाराम ने चौराहे की मिट्टी पर उंगली फेरते हुए कहा—“इस गाँव की किस्मत आज बदलने वाली है, रामू। लेकिन उससे पहले,
यह मिट्टी अपने सच का हिसाब लेगी।”
रात का अलौकिक क्षण
हवा और तेज हुई।
बरगद की शाखें पीड़ा में कराहने लगीं।चौपाल पर रखा पुराना पीतल का घंटा अपने आप हिल गया—
किसी ने छुआ भी नहीं था। लोगों की साँसें अटक गईं। और तभी—
दूर सड़क की दिशा से
एक आकृति धीरे-धीरे आती दिखाई दी। न नंगे पैर की आवाज़,
न कपड़ों की सरसराहट—
बस मौन। एक खामोश, भरी हुई चुप्पी। बूढ़ी औरत चीखकर पीछे हट गई—“कोई… कोई आ रहा है!”
रामशरण ने लालटेन ऊँची की।
आकृति धीरे-धीरे नज़दीक आई—
चेहरा बिल्कुल साफ नहीं,
मानो धुएँ की तरह बदलता हुआ।
गंगाराम ने शांत स्वर में कहा—
“ये इंसान नहीं है, रामू…
ये है इस गाँव के इतिहास की पहली परछाई।”सभी की धड़कनें रुक गईं।
गंगाराम ने प्रतीक्षा करते हुए फुसफुसाया—“अब कहानी शुरू होती है…”
आर एस लॉस्टम












