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दूसरी परछाई का उदय

धरमवीर की परछाई
हवा में घुलकर जैसे गायब हुई,
पर उसके जाते ही
रात का सन्नाटा और भारी हो गया।
लोगों ने सोचा—
शायद अब आतंक थम जाएगा।
पर अंधेरा मानो फुसफुसा रहा था—
“अभी नहीं… अभी बहुत बाकी है।”
बरगद के पत्ते एक साथ ऐसे काँपे
मानो उनमें कोई जान बस गई हो।
लालटेन की लौ कई बार बुझने–बुझने को हुई और हर बार एक अदृश्य हाथ ने उसे फिर से जगा दिया।
गंगाराम ने आकाश की ओर देखा—
“दूसरी परछाई उठने वाली है।”
लोग डर के मारे पीछे हट गए।
रामशरण ने काँपते हुए पूछा—
“गंगा… अब कौन आएगा?”
गंगाराम ने कहा—
“जिसका दर्द सबसे गहरा था।
जिसे इस गाँव ने
केवल मार नहीं डाला…
बल्कि उसकी आवाज़, उसकी इज़्ज़त, और उसकी पूरी पीढ़ी को
सदा के लिए कुचल दिया।”
सबकी साँसें एक साथ रुक गईं।

आवाज़ जो कभी सुनी नहीं गई

दूर मंदिर की घंटी अपने आप बज उठी। लोग काँप गए—क्योंकि वह घंटी
पिछले दो साल में किसी ने नहीं बजाई थी। मंदिर वीरान पड़ा था।
दरारें पड़ी थीं दीवारों में।
उस रात के बाद जब वहाँ किसी लड़की की लाश मिली थी। लड़की का नाम था—गुलनारी। एक १५ साल की बच्ची, जो किसी छिपे हुए राज की गवाह थी। कहते हैं—उसने कुछ देखा था,
जिसे देखना नहीं चाहिए था।
लोगों ने कहा—
वो सांप के काटने से मरी है।
पर सच्चाई गाँव की मिट्टी में
अब भी चीख रही थी।
ठीक उसी मंदिर की दिशा में
अब धुँध की एक लंबी,
पतली, काँपती हुई परछाई खड़ी थी।
रामशरण ने डरते हुए कहा—
“गंगा… ये बच्ची की…?”
गंगाराम ने सिर हिलाया।
“हाँ, रामू। ये गुलनारी की परछाई है।”
लोगों के पैरों तले धरती काँपने लगी।

गुलनारी की परछाई का चेहरा

परछाई धीरे-धीरे
मंदिर की सीढ़ियों से उतरने लगी।
उसके कदमों से कोई आवाज़ नहीं,
पर मिट्टी हर कदम पर फटी।

जैसे जमीन ने भी
उसके साथ हुए अन्याय को
याद रखा हो।उसका चेहरा साफ नहीं दिखता था—बस धुंधली आँखें,
जो किसी खोई हुई चीख की तरह
लोगों के अंदर उतरती जा रही थीं।
चौपाल के पास खड़ी एक औरत
थरथराते हुए बोली—
“मैं… मैं उसे जानती थी…
वो बहुत शांत बच्ची थी।”
गुलनारी की परछाई
उस औरत के सामने रुक गई।
औरत घुटनों के बल गिर पड़ी—
“मैंने उसे बचाने की कोशिश की थी,
पर मैं डर गई थी…”
गंगाराम ने कहा—“डर कभी अपराध से कम नहीं होता, दाई।”औरत फूट-फूटकर रोने लगी।

दूसरी सच्चाई का खुलासा

गुलनारी की परछाई
धीरे-धीरे चौराहे की तरफ मुड़ी
और वहीं रुककर
अपनी उँगली उठाई—इस बार
जिस घर की ओर इशारा हुआ,
वह देखकर गाँव एक पल को शांत हो गया। पर अगला ही पल
भूकम्प-सी हलचल फैल गई।
वो घर था—गुलनारी के चाचा का।
वही जिसने रात–रात भर
लोगों को बताया था
कि बच्ची सांप के काटने से मरी है।
वही जो हर दंगा, हर झगड़े में
सबसे आगे रहता था।
वही जो पितृ–सम्मान की बातें करता था और घर में नरक बनाकर रखता था। सरपंच, जो अभी धरमवीर की सच्चाई से टूटा खड़ा था,फुसफुसाया—“क्या… क्या उसने…?”गंगाराम ने दृढ़ स्वर में कहा—“हाँ। उसने ही गुलनारी को मारा।क्योंकि गुलनारी ने उसके अपराध को अपनी आँखों से देखा था।”

लोगों पर बिजली गिर गई।
चाचा की टाँगें लड़खड़ा गईं।
उसका चेहरा पीलापन लिए था।
कई पुरुषों ने उसकी ओर देखा—
नफ़रत, गुस्सा और एक अजीब अपराधबोध के साथ।
गुलनारी की परछाई
धीरे-धीरे उसकी ओर बढ़ने लगी।
चाचा पीछे हटता गया—इतना पीछे किबरगद के तने से जा टकराया।
गंगाराम ने कहा—“आज उसकी मौत नहीं होगी।आज उसे वो रात दिखाई जाएगीजिससे वो भागता है।”
परछाई ने अपना हाथ बढ़ाया—
हवा में एक तीखी सिसकी उठी
और चाचा ज़मीन पर गिर पड़ा,
चीखता हुआ—मानो उसे फिर से
वह दृश्य दिखाई दे रहा हो
जिसे उसने दबा रखा था।

गाँव का अपराध उजागर

गुलनारी की परछाई
धीरे-धीरे मंदिर की ओर वापस चली गई। और जाते-जाते
उसकी आवाज़ पहली बार सुनाई दी
न बच्चे की आवाज़,न स्त्री की,
बस एक टूटे हुए सत्य की आवाज़—
“मैं केवल शुरुआत थी…
अगली परछाइयाँऔर भी गहरी होंगी।”परछाई घुल गई। गाँव पर एक भारी,दम घोंटने वाली चुप्पी छा गई।
गंगाराम ने चौराहे की ओर देखते हुए कहा—“अब तीसरी परछाई उठेगी।
और वहगाँव का सबसे बड़ा पाप है।”
लोगों ने एक-दूसरे को देखा
डर, पसीना, अपराधबोध और अंधेरा
साथ-साथ बह रहा था।
गंगाराम ने अंतिम वाक्य कहा
“अब जो आएगा,
वह किसी एक व्यक्ति का नहीं
पूरे गाँव का अपराध है।”

आर एस लॉस्टम

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