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कहां कहां ना ढूंढा उस को

कहां कहां ना ढूंढा उस को
जाने कैसा मन घबराया,
जंगल जंगल पर्वत कंदर,
कहां कहां ना ध्यान लगाया!!

धर्म ग्रंथ भी पढ़कर देखे
उस को कभी कहीं ना पाया।
दान धर्म और पूजा कर ली,
मंदिर जा मस्तक नवाया।

लाखों ऋषि मुनि ज्ञानी देखें
उसका फिर भी पता ना पाया,
अपने ही दिल में जो झांका
उसको वां मुस्काता पाया।

कस्तूरी मृग बनकर डोला
मैं था मूरख मन भरमाया,
जन्म गंवाया तुझे ढूंढते
तेरी कृपा से तुझको पाया।

सुलेखा चटर्जी

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