
पहाड़ी की ओर से उठी वह कराह अब भी हवा में तैर रही थी।
ऐसा लग रहा था जैसे पूरे गाँव के ऊपर
किसी ने मौत की चुप्पी ओढ़ा दी हो।
कोई बोल नहीं रहा था।
लालटेन की लौ फिर से काँप उठी—
मानो उसे भी डर लग रहा हो।
राशिरण ने घबराकर गंगाराम का हाथ थाम लिया।
“गंगा… ये कैसी आवाज़ थी?
किसी इंसान की… या किसी और की?”
गंगाराम ने सिर उठाकर अँधेरे को देखा।
उसकी आँखें रात के भीतर छिपे राज टटोल रही थीं।
कुछ देर बाद वह बोला—
“ये आवाज़ देह की नहीं थी, राशिरण…
ये दबे हुए सच की आवाज़ थी।”
भीड़ में धीमी-सी फुसफुसाहट फैल गई।
एक बूढ़ा बोला—
“सच भी कभी मचलता है?”
गंगाराम ने उसकी ओर देखा—
“हाँ…
जब उसे बहुत देर तक ज़मीन में गाड़ दिया जाए।”
उसने पहाड़ी की ओर इशारा किया।
“वहाँ… उसी टीले के नीचे
कुछ दिनों से कुछ दबा हुआ है,
पर उसे सही से दफनाया नहीं गया।”
राशिरण का कलेजा काँप उठा।
“लाश?”
गंगाराम ने सिर हिलाया।
“लाश नहीं…
किसी की अधूरी इच्छा,
किसी का अधूरा बदला,
किसी का अधूरा न्याय।”
भीड़ फिर खामोश हो गई।
तभी सड़क किनारे रहने वाली विधवा चाची
काँपती हुई आगे आईं।
“गंगा बेटा…
कल रात मैंने भी एक परछाईं देखी थी।
घर के पिछवाड़े—
इंसान जैसी…
पर उसके पाँव…
मिट्टी में धँसे हुए थे।
वो चल नहीं रही थी,
बस सरक रही थी…”
गंगाराम ने आँखें मूँद लीं।
“वो परछाईं किसी इंसान की नहीं थी, चाची।
वो उस रात की थी—
जिसे इस गाँव ने कभी भुलाया नहीं,
जिसे सबने मिलकर दबा दिया,
पर जिसने खुद को दफन होने से इनकार कर दिया।”
राशिरण बेचैन हो उठा।
“कौन-सी रात, गंगा? साफ-साफ बता!”
गंगाराम ने गहरी साँस ली।
उसके शब्द भारी हो उठे—
“वो रात…
जब पहाड़ी पर आग लगी थी।
जब खेतों की ओर कोई नहीं गया था।
जब किसी की चीख सुनकर भी
लोगों ने अपने दरवाज़े बंद कर लिए थे।
वो रात…
जब दो जातियों की लड़ाई में
किसी तीसरे का घर जला दिया गया था।”
लोगों के चेहरे बदल गए।
“गंगा… वो पुरानी बात मत छेड़!”
“उस दिन जो हुआ, गलती थी!”
“सब भूल चुके हैं!”
गंगाराम ने उन्हें रोकते हुए कहा—
“इंसान भूल सकता है,
पर इतिहास नहीं।
और इतिहास की परछाइयाँ
कभी-कभी रात में लौट आती हैं।”
फिर वह धीरे-धीरे पहाड़ी की ओर बढ़ा।
राशिरण घबरा गया।
“किधर जा रहा है?”
“वहीं… जहाँ से आवाज़ उठी थी,”
गंगाराम बोला।
“आज नहीं गए तो
ये परछाइयाँ लोगों के दिलों में बस जाएँगी—
डर, अपराधबोध और पछतावा
सब एक हो जाएगा।”
राशिरण उसके पीछे-पीछे चल पड़ा।
भीड़ भी—डरी हुई, पर खिंची हुई।
हर कदम के साथ हवा ठंडी होती जा रही थी।
पत्तियाँ अपने-आप हिल रही थीं,
मानो किसी अदृश्य हाथ ने उन्हें छू लिया हो।
पहाड़ी के नीचे पहुँचकर गंगाराम रुक गया।
उसने ज़मीन पर हाथ रखा।
“यहीं…”
वह फुसफुसाया,
“यहीं से वो आवाज़ उठी थी।”
मिट्टी सूखी थी,
पर अजीब-सी दबी हुई।
गंगाराम ने धीरे-धीरे मिट्टी हटानी शुरू की।
भीड़ साँस रोके देखती रही।
तभी किसी की उँगलियाँ
किसी ठंडी, कठोर चीज़ से टकराईं।
“गंगा… ये क्या है?”
उसने उसे बाहर निकाला।
सब सन्न रह गए।
वो काली चोटियों की एक टूटी हुई चोटी थी—
एक सिरे से जली हुई,
दूसरे सिरे पर सूखे खून के धब्बे।
बूढ़ी औरत चीख पड़ी—
“ये तो…
पचास साल पहले मरी
चुन्नी काकी की चोटी है!”
गंगाराम की आवाज़ भारी हो गई।
“और यही थी उस रात की पहली गवाही।
इसे जलाकर दफनाया गया—
ताकि सच भी जल जाए।”
भीड़ में सन्नाटा छा गया।
किसी ने धीमे से पूछा—
“तो चुन्नी काकी की मौत…
दुर्घटना नहीं थी?”
गंगाराम ने सबकी ओर देखा।
“नहीं।
वो दुर्घटना नहीं थी।
वो हत्या थी।
और आज…
उसका सबूत खुद रात ने लौटा दिया है।”
हवा तेज़ हो गई।
पेड़ों की शाखाएँ हिलने लगीं।
लालटेन की लौ बुझ गई।
अँधेरे में
गंगाराम की आवाज़ गूँजी—
“अब सच जाग चुका है, राशिरण।
परछाइयों का दौर शुरू हो गया है।
अब इस गाँव से
कोई और अधूरी आवाज़
लौट कर जाएगी…”
उसका वाक्य पूरा भी नहीं हुआ था
कि पहाड़ी के ऊपर से
फिर वही ठंडी, लंबी,
दर्द से भरी कराह सुनाई दी।
और गाँव समझ गया—
ये सिर्फ़ शुरुआत थी।
आर एस लॉस्टम












