
सनातन अंक ग्यारह- इक्कीस- इक्यावन हैं मन्वंतर।
अनादि-अनंत ये संस्कृति उत्तर-दक्षिण व्याप्त कालांतर।
आवे शुभता-अभिवृद्धि हो फैले ज्ञान आध्यात्म निरंतर।
बहे शुचिता हृदय जड़-जीवन सकल ब्रह्मांड के अंतर।
पच्चीस-पचास व शत पाश्चात्य सभ्यता–ये हैं पूर्णांक।
नहीं कहीं इन में अभिवृद्धि, कहें भारत के गणांक।
शून्य से महाशंख गणना उद् घोषक भारतीय मनीषी।
निःसंदेह अंकावली विश्व ने भारत के महर्षियों से सीखी।
महारानी विक्टोरिया पचास वर्ष हुए थे राजगद्दी पर पूरे।
1887 में स्वर्णजयंती मनी लंदन,ख्वाब हुए रानी के पूरे।
परंपरा प्रचलित हुई भारत में भी वर्षगांठ लगे मनावन।
पचास और सौ है पूर्णता , शुभ नहीं इक्यावन है पावन।
स्वर्ण जयंती, हीरक जयंती यदि एक वृद्धि हो सिद्धि पाते।
पूर्ण संख्या अंत दर्शाते वहां नैसर्गिकता नहीं,तब वृद्धि पाते
सात सौ वर्ष रही दासता,कहां स्व ज्ञान हम जा रहे भुलाते।
वि.सं.२१०० पार भारत समक्ष मिलेगा विश्व माथा झुकाते।
भारत क्यों प्रचलन ये, इक्यावन एक सौ एक या हो आठ।
धर्मशास्त्र-ज्योतिषशास्त्र वेद-वेदांग सत्य की मिले न काट।
अपनी संस्कृति अपने साथ जियें विश्व में हम गर्व के साथ।
लाभ,प्रसन्नता वंशवृद्धि निरोगी कहे शास्त्र, जिएं निस्वार्थ।
महेश शर्मा,करनाल











