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धैर्य – पंचविश्वास का आधार

जब आत्मा यह निश्चय करे सही राह पर चलना है,
हर दिन खुद को थोड़ा बेहतर इंसान बनना है।
ठोकर में जो हिम्मत हार जाए, वह व्रत सच्चा नहीं,
धैर्य ही व्रत को थामे रखता, गिरने देता नहीं।

जब जीवन नियमों की राहों में ढलने लगता है,
समय, कर्म, व्यवहार सभी संतुलित होने लगता है।
कभी थककर मन ऊब जाए, रुकने सा हो जाता है,
धैर्य भीतर हौसला भर फिर आगे बढ़ाता है।

जब कर्तव्य पुकारे हमको, राह कठिन दिखती है,
मेहनत पास खड़ी होती, मंज़िल दूर लगती है।
बीच सफर में मन थककर रुकना चाहे अगर,
धैर्य ही कदम बढ़वाता, देता साहस अमर।

जब मन लक्ष्य से जुड़ जाए, वही निष्ठा कहलाती,
दुनिया डगमग हो जाए, पर दिशा नहीं बदल पाती।
फल मिलने में देर लगे, समय परीक्षा लेता है,
धैर्य ही निष्ठा की जड़ों को और गहरा करता है।

व्रत जीवन में तभी टिके जब धैर्य साथ होता है,
अनुशासन जीवित रहता जब धीरज पास होता है।
कर्तव्य-पथ पर चलना भी संभव तब हो पाता है,
निष्ठा अडिग बनी रहती जब धैर्य साथ देता है।

धैर्य शोर नहीं करता, चुपचाप साथ निभाता है,
गिरते मन को थामे रखता, भीतर शांति लाता है।
पंचविश्वास की यह साधना तब पूरी हो पाती है,
जब धैर्य हर मोड़ पर अपनी छाया फैलाता है।

जो जीवन में धैर्य रखता, वह जीवन का सुख पाता,
जीवन में फिर दुःख अधिक देर तक टिक न पाता।
ईश्वर देर नहीं करता, बस सही समय चुनता है,
धैर्य हमें विश्वास भरा मधुर इंतज़ार सिखाता है।

जब व्रत, अनुशासन, कर्तव्य, निष्ठा संग आते हैं,
तब धैर्य उन्हें तूफानों में भी टूटने से बचाता है।
यही साधना, यही तप है, यही जीवन का सार,
धैर्य रहे तो हर संघर्ष बन जाता जीवन-उपहार।

योगेश गहतोड़ी “यश”

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