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देश के सपूतों की कुर्बानी को भूल गए हम – कवि संगम त्रिपाठी

     हमें स्वतंत्रता मिली है उसकी कहानी पढ़ो तो आंख में आंसू आ जाते है। आज हम आजादी के दीवानों के बलिदान के कारण ही स्वतंत्र परिवेश में रह रहे हैं। आजादी के दीवानों ने अपना तन-मन-धन सब कुछ न्योछावर कर दिया सिर्फ अपने वतन के लिए एक ओर उनकी कुर्बानी दूसरी ओर आज की आजादी....... शहीदों ने कभी सोचा नहीं होगा की आजाद भारत के लोगों  की मानसिकता इतनी गुलाम हो जाएगी।
        आज मां अपने बच्चे को मम्मी-पापा कहना सिखाती और गौरवान्वित महसूस करती है...... मेहमान घर में आते है तो ए बी सी डी और वन टू का फोर अपने बच्चे से सुनाने को कहते है..... और पापा - मम्मी मंद मंद मुस्कराते है......सच पूछो तो यह दृश्य अपने आप में क्या कहता है। हम आजाद होने के बाद अपनी भाषा को सीखने और बोलने में गंवार पन महसूस करते है..... कितनी बड़ी विडम्बना है।
          आज गांव देहात में भी लोग हिंदी के साथ अंग्रेजी शब्दों का ज्यादा प्रयोग कर अपने को बहुत पढ़ा लिखा महसूस करते है। आजादी अपनी भाषा और वो भी हिंदी ने सारे देश को एक सूत्र में बांध कर दिलाने में जो भूमिका निभाई है उसका थोड़ा अध्ययन कर लीजिए तो आपको अपनी भाषा का महत्व समझ में आ जाएगा.....आज अंग्रेजी शिक्षा के नाम से जो लूट मची है वह सर्व विदित है और तो और लोग मंहगाई का रोना रोते हैं ........ जबकि आज अंग्रेजी शिक्षा प्रणाली ने आम भारतीय की कमर तोड़ दी है उस पर चिंतन करने की जरूरत है।
     दुनिया में जितने भी विकसित देश है सब अपनी भाषा का उपयोग करते हैं..... और हम विकासशील होने का ढिंढोरा पीटने में लगे है वह हमें कहां ले जाएगा किसी को पता नहीं है।
      आजादी के दीवानों को उनकी जयंती पर याद कर लेना अच्छी बात है.....मेरा तो यही कहना है हम नित्य याद करे और उनके मार्ग में चल कर अपनी भाषा अपनी संस्कृति को समृद्ध बनाने हेतु निष्ठावान होकर काम करें जिससे हम मानसिक गुलामी से भी आजाद हो सके और आजादी को नारों- वादों तक ही सीमित न रहने दें।

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