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लाठियाँ ही मानवीय सुधार का कारण क्यों

लाठी संस्कृति का ही चारों ओर प्रसार है
वार्तालाप सुलह से नहीं अब कोई सुधार है

पापों की दूनियाँ मे पाप ही पुण्य मे बदल रहे है
पापी ही सन्त महात्मा मौलवी बन रहे है

इन्सान जानवर जानवर इन्सान की फितरत मे आ रहे है
मार खाकर पर भी ना सुधरने का शहूर अब इंसानों मे आ रहे है

उल्टी इस रवायत से ईश्वर भी पेशोपेश मे पड़ रहे है
ढीठ मक्कार धूर्तता इंसानी हुनर बनते जा रहे है

दिल दिमाग अब इंसानों मे लुप्त प्राय होते जा रहे है
हित साधने हर सीमा को लान्घते जा रहे है

नीचा एक दूजे को दिखाने का दस्तूर अब बाज़ार-ए-आम हो गया है
रिश्ते नाते अपनापन अब किस्से कहानियों की ज़ीनत हो गया है

इंसानी बस्ती मे रहकर भी इंसानी तहजीब से रुखसत हो गये
खुदा की बनायी इस खुशमिज़ाज इंसानी रवायत से ही खफा हम हो गये


संदीप सक्सेना
जबलपुर म प्र

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