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भौर-काल की देवी

लिख लूं गा मन के भाव
उन्हें शब्दों से
अलंकारों से सजा लूंगा
तुम भावाभिव्यक्ति की ऊर्जा हो
तुम रहती हो मोन
मेरे भाव, मेरे शब्द भी तो हैं मोन
तुम नहीं तो
गाएगा कौन ।
आ जाती सपन में… मुझ बिन पहचाने कौन ?
उठ कर भौर-काल में काव्य रूप में
शब्द हो जाएं साकार
ऐसा क्यूं होता है बार-बार।
कभी ‘ सती ‘ के रूप में
विलग हो गई
उच्छल गंग की जलधार ।
प्रेम हृदय में–
हिल्लोरित पवित्र गंग-सी धार ।
भूत-वर्तमान-भविष्य तीनों
मस्तिष्क पर छाएं बारंबार
दिग्दर्शन तब कराएं… किधर चला संसार।
हे देवी ! तुम संग हो ब्रह्म काल
इस जग में न जाने
कितनी आत्माओं का
हो पुनः पुनः उद्धार !

वीणा वादिनी का हो रूप
तुम नहीं तो शब्दावली कुरूप ।

मेरी वाणी में वो माधुर्य नहीं
वाद्य यंत्र बजाएगा कौन ।
जब-जब भावनाओं में बहता हूं
मन उपजे भाव लिख पाता हूं ।
बार-बार शब्द लहर में बह जाता हूं
भाव तरंग में… मौन शब्दों में
तेरा स्मरण कर पाता हूं।
ब्रह्म-काल में ऊर्जा बरसे… सद् ज्ञान का गंगा जल सरसे ।

         - महेश शर्मा, करनाल

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