
सरहद की मिट्टी का बुलावा अभी बाकी था,
कि हवाओं में सिसकियों का संचार होने लगा।
‘जल्द वापस आऊँगा’— बस इसी एक दिलासे से,
एक सूने घर में इंतज़ार का आगाज़ होने लगा।
वो आज भी पत्थर की चौखट से सिर टिकाए,
काफिले के गुबार में तुम्हारा अक्स ढूँढती है।
वहाँ… मलबे में दबी एक जली हुई लकड़ी,
सफेद बर्फ के बीच सीलन से भरी धँसी है,
जो तुम्हारी सांसों की गर्म ‘आँच’ का इंतज़ार करती है।
वो खड़ी है गमगीन लोगों की लंबी कतार में,
हाथों में यादों की रजिस्ट्री का इकरारनामा लिए,
तुम्हारे ताबूत के करीब अपनी बारी की प्रतीक्षा में।
इंतज़ार है— चीखती भीड़ के छँटने का,
इंतज़ार है— वतन के लिए तुम्हारे अंतिम फैसले का।
तुम्हारी हथेली की वीरता वाली रेखाओं को गिनने का,
उसे बस… तुम्हारे लौट आने का इंतज़ार है।
रजनी कुमारी
लखनऊ उत्तर प्रदेश












