
बदलते वक्त के कौशल,
लिए पहचान चलते हैं,
हुनर जो सीख लेते हैं,
वही जीशान चलते हैं।
दिखाती है आइना जो,
वही स्वजागरूकता है।
परख कर अपनी ताक़त को,
लिए स्वाभिमान चलते हैं।
’सहानुभूति’ का मरहम,
जो दिल पर रख दिया हमने,
तो बनाकर हम ज़माने का,
यहाँ सम्मान चलते हैं।
’समीक्षा’ जब भी करते हैं,
हम अपनी सोच की हरदम,
बनाकर तर्क की दुनिया,
लिए हर शब्द चलते हैं।
’रचनात्मकता’ का नया,
चश्मा पहन कर हम,
बदलकर सोच सबकी हम,
नया आयाम गढ़ते हैं।
लिए ‘निर्णय’ भी साहस से,
‘समस्या’ भांप लेते है,
सुलझते हर कदम पर हम ,
लिए समाधान चलते हैं।
संप्रेषण प्रभावी हों,
और अंतर्क्तिक संबंध हों।
लिए हम साथ अपनों का,
नया अरमान चलते हैं।
’तनावों’ को हरा करके,
और ‘संवेगों’ को बस में कर,
सदा हम मुस्कुरा करके,
सभी से बात करते हैं।
रीना पटले, शिक्षिका
जिला सिवनी ,मध्यप्रदेश












