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दुल्हन ही दहेज है

धन-दौलत के मोल न तोल
नारी कोई वस्तु नहीं है गोल।
सपनों की वो रानी है
हर रिश्ते की वह निशानी है।

ब्याह है एक बंधन प्रेम का
नहीं सौदा ये कोई धन-ऋण का।
जो भी मांग करे उपहारों की
वो क्या ही जाने कीमत प्यारों की?

जिसने जीवन संजोया है
घर आँगन में रंग को बोया है।
जिसके कदमों से ही घर में लक्ष्मी आए
क्यों उससे दहेज की बात कराए?

माँ-बाप ने पाल-पोस कर
संस्कारो में रंग दे कर भेजा।
क्यों फिर लोभ से उसका अपमान हो?
और क्यों फिर ससुराल में उसका अपकार हो?

अब वक्त है जागने का
रूढ़ियों को आग लगाने का।
कह दो समाज से, स्पष्ट कह दो,
“दुल्हन ही दहेज है”, और कुछ मत दो।

इज्ज़त दो, सम्मान दो
उसके सपनों को पहचान दो।
और प्यार से घर को अपने स्वर्ग बनाओ,
दहेज नहीं, रिश्तों को निभाओ।

पल्लवी द्विवेदी!
प्रयागराज उत्तर प्रदेश

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