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रिश्ते – एक ग़ज़ल

रिश्ते भी दरिया हैं, साहिल भी तू ही है,
मेरे हर एक सवाल का हासिल भी तू ही है।

मैं ढूँढता रहा तुझे चेहरों की भीड़ में,
जब आँख बंद की तो मेरा दिल भी तू ही है।
सजदे में झुक गया तो ये एहसास हो गया,

जिसको समझ रहा था मैं, काबिल भी तू ही है।
रूठे हुए थे लोग तो मायूस था बहुत,
दरवेश ने कहा — ये क़ातिल भी तू ही है।

नफ़्सों की आग में जो जले, वो खाक हो गए,
इश्क़ की राह में मगर मंज़िल भी तू ही है।

मैं, तू, वो — ये फ़ासले सब वहम निकले,
जब पर्दा उठा तो मेरा क़ातिल भी तू ही है।

रिश्तों को नाम देना फक़त रस्म भर रहा,
हर रूह की गहराई में शामिल भी तू ही है।

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