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पंचायत की आग

गाँव के खुले मैदान में हवा बेचैन थी—मानो उसी पल कुछ बड़ा होने वाला हो।
लालटेन अभी बुझी नहीं थीं, और सूरज पूरी तरह बाहर नहीं आया था।
गाँव उस बीच की रोशनी में खड़ा था—अधूरा, काँपता, लेकिन भीतर कहीं एक उम्मीद लिए।
चौपाल के बीच बाँस की बड़ी चौकी रखी थी।
आज पहली बार किसी दबंग की हवेली में नहीं, बल्कि खुले मैदान में पंचायत हो रही थी।
अंजना आगे खड़ी थी।
उसके पीछे राजन, मवि और कई युवा—जो आज पहली बार अपने गाँव को डर के विरुद्ध खड़ा होते देख रहे थे।
गंगाराम धीरे-धीरे आया और चौकी के पास बैठ गया।
उसकी आँखों में गहरी चेतावनी थी, लेकिन आवाज में दृढ़ता—
“आज गाँव अपना सच सुनेगा।”
लोग धीरे-धीरे पास आकर बैठने लगे।
और तभी—जंजीरों की खनक जैसी आवाज के साथ चार मोटरसाइकिलें चौपाल के सामने आकर रुकीं।
बलदेव सिंह का बेटा सुरेश सबसे आगे उतरा।
पीछे उसके तीन साथी—लाठी, डंडे और गुस्से से भरी आँखें।
उनके चेहरे साफ कह रहे थे—आज डर दिखाना है।
गाँव में कानाफूसी उठी।
कुछ बच्चे पीछे हट गए।
कुछ औरतों ने सिर ढककर बच्चों को सीने से चिपका लिया।
लेकिन अंजना ने एक भी कदम पीछे नहीं लिया।

  1. पहला टकराव
    सुरेश ने ऊँची आवाज में कहा—
    “ये कैसा तमाशा लगा रखा है? पंचायत कोई खुला खेल है क्या?”
    राजन आगे बढ़ा—
    “यह पंचायत है, धौंस नहीं। अगर डराने आए हो तो वापस जाओ।”
    सुरेश हँस पड़ा—
    “डराने? हम डराते नहीं… औकात याद दिलाते हैं।”
    मवि गुस्से से काँप गया। उसने चिल्लाकर कहा—
    “औकात तुम्हारी तब खुलेगी जब हवेली की दीवारें सच उगलेंगी!”
    सुरेश का चेहरा सख्त हो गया।
    उसने पहला वार शब्दों से नहीं, तिरस्कार से किया—
    “तुम तो हमारे घर की दहलीज़ चाटते थे, अब सच के ठेकेदार बन गए?”
    मवि आगे बढ़ा,
    लेकिन राजन ने उसे पकड़ लिया—
    “नहीं मवि, आज लड़ाई दिमाग की है… हाथ की नहीं।”
    अंजना ने पहली बार बोलना शुरू किया—
    “हम यहाँ किसी को नीचा दिखाने नहीं आए हैं।
    हम सिर्फ इतना सवाल पूछने आए हैं—
    गाँव में अब तक जितनी हत्याएँ हुईं… उनका सच कहाँ है?”
    सुरेश की हँसी अचानक रुक गई।
    उसके पीछे खड़ा एक आदमी सहम गया।
  2. भीड़ की जागृति
    अंजना ने भीड़ की ओर मुड़कर कहा—
    “कितनों ने अपना घर का लड़का खोया?
    कितनों के पिता रात में गायब हुए?
    कितने खेतों में खून मिला?”
    भीड़ में अजीब खामोशी छा गई।
    कुछ बूढ़े सिर झुकाए बैठे थे।
    कुछ औरतें चुपचाप रो रही थीं।
    एक बुज़ुर्ग आगे आए।
    काँपती आवाज में बोले—
    “हमने डर से मुँह बंद रखा… कई सालों तक।”
    गंगाराम ने उनका हाथ पकड़ा—
    “आज मुँह खोलने का दिन है।”
    अंजना ने कहा—
    “आज की पंचायत सिर्फ फैसला नहीं देगी—
    आज गाँव अपने अपराध गिनेगा।”
  3. और तभी… पहला वार
    सुरेश ने गुस्से में लाठी उठाई और जमीन पर मारी।
    धूल उड़ गई।
    “बस!” वह चिल्लाया।
    “ये पंचायत नहीं चलेगी! ये लड़की गाँव को बाँट रही है!
    सरकारी एजेंट है ये! दंगा कराएगी!”
    कुछ लोग डर के मारे पीछे हटे।
    कुछ लड़कों ने हिम्मत करके लाठियाँ उठा लीं—जैसे कह रहे हों, अब और नहीं।
    अंजना बिल्कुल शांत रही।
    उसकी आवाज इतनी स्थिर थी कि हवा भी थम गई—
    “अगर तुम्हें सच से इतनी ही तकलीफ है,
    तो मतलब कुछ न कुछ छुपा रहे हो।”
    सुरेश उसका गला पकड़ने को बढ़ा—
    लेकिन उसी पल राजन और मवि दोनों बीच में आ गए।
    तीनों के टकराने से भीड़ में हलचल फैल गई।
    कुछ युवक सुरेश को पकड़ने लगे।
    कुछ उसके साथियों पर टूट पड़े।
    मोटरसाइकिलें धक्का लगने से गिर पड़ीं।
    और उसी क्षण—
    गाँव ने पहली बार डर को पीछे धकेल दिया।
    भीड़ का शोर बढ़ने लगा।
    औरतें बच्चों को लेकर भागने लगीं।
    चौपाल की धूल हवा में उछल रही थी।
    लोगों की आवाज़ें—डर और गुस्से का मिला-जुला शोर—आग की तरह फैल गईं।
  4. वह स्वर जिसने सब रोक दिया
    ठीक उसी अफरातफरी के बीच गंगाराम ने अपनी पूरी ताकत से चिल्लाया—
    “रुको!! सब रुक जाओ!!”
    उसकी आवाज पत्थर को भी चीर दे, ऐसी थी।
    शोर धीमा पड़ा।
    लोग कुछ पल के लिए ठिठक गए।
    गंगाराम की छड़ी काँप रही थी,
    लेकिन उसकी आँखों में गुस्सा भी था और दुर्लभ स्पष्टता भी।
    वह अंजना की ओर इशारा कर बोला—
    “आज यह लड़की वो सवाल पूछ रही है
    जिसे पूछने की हिम्मत गाँव में किसी ने नहीं की।
    अगर इसे रोका—
    तो समझ लो, तुमने गाँव की आत्मा को मार दिया!”
    भीड़ एकदम शांत हो गई।
    अंजना आगे बढ़ी।
    उसकी आवाज नरम थी, लेकिन धार लोहे जैसी—
    “अगर इस पंचायत को रोकना है… तो वजह बताओ।
    अगर हमें चुप कराना है… तो सच का सामना करो।”
    सुरेश ने चारों ओर देखा—
    लेकिन उसके साथ खड़े लोग धीरे-धीरे पीछे हटने लगे।
    आज पहली बार हवेली का डर
    सच के बोझ से हल्का पड़ रहा था।
  5. और फिर… वह काला साया प्रकट हुआ
    अचानक हवेली की तरफ से एक जीप तेज़ी से आती दिखाई दी।
    धूल का गुबार उठा।
    जीप पर दो आदमी बंदूक लिए बैठे थे।
    और अंदर—बलदेव सिंह खुद।
    लोग सिहर उठे।
    बच्चों की रोने की आवाज़ हवा में भर गई।
    पंचायत का पवित्र चौक अब युद्धभूमि में बदल चुका था।
    अंजना ने राजन का हाथ दबाया।
    धीरे से बोली—
    “अब असली फैसला होगा।”
    हवा भारी हो गई।
    धूल जैसे थम गई।
    गाँव की साँसें अटक गईं।
    और बलदेव सिंह जीप से उतरा—
    उसी चेहरे के साथ, जिसने वर्षों से गाँव को डराकर रखा था।
    उसकी आँखों में अहंकार था।
    होठों पर हल्की-सी तिरछी मुस्कान।
    वह चौपाल की ओर बढ़ा—
    जैसे यह सब उसका ही खेल हो।
    लेकिन आज—
    खेल बदल चुका था। आर एस लॉस्टम

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