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संदीप शर्मा सरलदेहरादून उत्तराखंड

इश्क इंतजार और इबादत को पहचानते हो
जो कहा हाँ तो कुछ न जानते हो।।

ये इश्क बडी बेपरवाह और बेजार शय है
इंतजार इसकी हद और सब्र सब तय है।।

इबादत की हद तक जो हो जाए तो वो इश्क है वाजिब ,
तुम समझे मौत तो सच है सरल सच मे जानिब ।।

ये बावस्ता से वास्ता और हर शय बेदम
तुम कहते इश्क तो निकले हर दम ये तय भर दम।।

सब शामिल है इस दौर मोहब्बत की राहगीर;
गर कहते इश्क या फिर मोहब्बत तो हां है जालिम।।

नही समझे ये जुमले तो नादां हो या हो काफिर
समझ गए गर जो बात तो इबादत है वाजिब।।

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