
बेवफ़ाओं के शहर में वफ़ा की उम्मीद रखते हैं,
यहाँ दुआ मिले या न मिले, बद्दुआ भरपूर मिलते हैं।
ज़ख्म पर मरहम कोई लगाता नहीं इस वीरान बस्ती में,
हाँ, नमक छिड़कने वाले मगर हर मोड़ पर मिलते हैं।
चेहरों पर मुस्कान लिए लोग बहुत दिखते हैं,
पर दिलों के दरवाज़े अक्सर बंद ही मिलते हैं।
लोग तो ज़िंदा हैं शायद इस नगर में,
पर रूह से खाली, मुर्दों से नज़र आते मिलते हैं।
शहर मशहूर बहुत हैं ऊँची-ऊँची इमारतों से,
मगर इनमें “घर” कहाँ हैं — ये सवाल हर दिल में मिलते हैं।
आदमी तो बहुत देखे हमने, बड़े-बड़े लोग भी,
पर उन सब के बीच इंसान कहाँ मिलते हैं।
नाम, ओहदे, शोहरत सब पास हैं जिनके,
मगर सीने में धड़कते अरमान कहाँ मिलते हैं।
भीड़ में चेहरे कई खो गए, गुमनाम हो गए,
अब पहचान के भी चेहरे अजनबी से मिलते हैं।
खुशियाँ रूठ गईं, मेरी किस्मत तराशते-तराशते,
हाथों में छाले पड़े, पत्थर सा दिल सहलाते-सहलाते।
सपनों की मूर्ति गढ़नी चाही थी मैंने,
पर टूट गए अरमान उन्हें सजाते-सजाते।
राहों ने साथ न दिया, मंज़िलें भी दूर रहीं,
हम थक गए खुद को समझाते-समझाते।
अब शिकवा भी किससे करें, ऐ दिल,
हम ही खो गए अपनी दुनिया बसाते-बसाते।
आर एस लॉस्टम












