
गाँव की वादी अब सन्नाटे में डूबी थी,
लेकिन यह सन्नाटा डर का नहीं — शांति और उम्मीद का था।
रात की भयानक परछाइयाँ धीरे-धीरे गायब हो रही थीं।
भोर की पहली किरण पेड़ों और खेतों पर उतर रही थी,
जैसे हर किरण के साथ गाँव की आत्मा ने गहरी साँस ली हो।
- बलदेव का सामना
बलदेव ज़मीन पर बैठा था — हताश और थका हुआ।
आँखों में डर और पछतावे की झलक थी।
गंगाराम उसके पास आया और शांत स्वर में बोला—
“बलदेव, अब समय आ गया है कि तुम अपने पापों का सामना करो।
तुमने कई परिवारों की रातें छीनीं, कई बच्चों की हँसी दबाई —
अब जवाब देना होगा।”
बलदेव ने गर्दन झुका ली। शब्द उसके होंठों तक आकर रुक गए।
भीड़ उसके चारों ओर खड़ी थी, लेकिन किसी ने हाथ नहीं उठाया।
सब जानते थे — अब ताकत नहीं, बल्कि सच निर्णायक होगा।
अंजना आगे बढ़ी और बोली—
“तुम्हारे डर की दीवार गिर चुकी है।
आज यह गाँव फिर से जीने के लिए आज़ाद है।
तुम्हारा समय समाप्त हो गया।”
बलदेव ने धीमे स्वर में कहा—
“मैं… मैंने सोचा था… मैं सही कर रहा हूँ… लेकिन…”
गंगाराम ने उसकी बात काट दी—
“सही और गलत का फैसला अब यह गाँव करेगा,
न कि तुम्हारा अहंकार।” - गाँव की हिम्मत
गाँव वाले धीरे-धीरे मैदान में आगे बढ़े।
वे अब डरे हुए नहीं थे।
हर चेहरे पर साहस और शांति थी।
अंजना और राजन ने उन्हें प्रेरित किया—
“आज से यह गाँव सिर्फ नाम के लिए नहीं,
सच और न्याय के लिए जिएगा।”
भीड़ ने मिलकर पुरानी परछाइयों को याद किया—
मौतें, दर्द, झूठे इल्ज़ाम —
सबका सामना किया।
जैसे ही उन्होंने अपने डर को स्वीकार किया,
परछाइयाँ गायब हो गईं।
गाँव की आत्मा अब मुक्त थी। - बलदेव की अंतिम परीक्षा
बलदेव अब अकेला खड़ा था।
भीतर का डर और पछतावा उसे जला रहा था।
गंगाराम ने कहा—
“अब तुम्हें खुद का सामना करना होगा।
तुम्हारे पाप तुम्हारा पीछा नहीं छोड़ेंगे।
लेकिन अगर तुम सच स्वीकार करोगे,
तो शांति पाने का अवसर मिलेगा।”
कुछ पल की चुप्पी के बाद
बलदेव ने अपना घमंड छोड़ते हुए कहा—
“हाँ… मैंने गलत किया।
मैंने डर फैलाया, लोगों को चोट पहुँचाई।
अब मैं सज़ा भुगतने के लिए तैयार हूँ।”
अंजना मुस्कुराई—
“सच से कभी डरना नहीं चाहिए।
यह तुम्हारे और गाँव के लिए नई शुरुआत है।” - नई सुबह
सूरज की रोशनी ने गाँव के हर कोने को छू लिया।
खेतों में हल्की हवा बह रही थी।
पेड़, जो रात भर काँप रहे थे, अब स्थिर थे।
गाँव वाले एक-दूसरे के पास आए,
हाथ मिलाए और आशा की नई किरण महसूस की।
गंगाराम बोला—
“यह सिर्फ एक दिन नहीं,
यह नई शुरुआत है।
अधूरा इतिहास अब पूरा किया गया है।
जो डर कभी यहाँ था, वह अब मिट चुका है।”
अंजना ने मैदान की ओर देखा और कहा—
“आज से यह गाँव अपनी आत्मा के साथ जिएगा।
सत्य और न्याय का रास्ता हमेशा बना रहेगा।”
उस सुबह,
गाँव ने पहली बार सच में साँस ली।
भूतकाल की परछाइयाँ पीछे रह गईं,
और भविष्य की किरणें उजाले में चमक उठीं।
आर एस लॉस्टम












