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कोई अपना होता

मैं अकेला चल रहा था साथ सपनों को लिए,
मन में मैं ये सोचता था जिए अब किसके लिए?
नजर धुंधली हो चली है साँझ की बेला है यह,
खुद ही मन में सोचता,कौन हूं मैं? कौन है यह?
खूब जोड़ा औ’बटोरा,आज मैं क्यों मन में रोता?
भीड़ है हर सूं यहां पर,कोई अपना भी तो होता!

रोज दिखते लोग वो पहचाने से चेहरे हैं मगर,
दुख डगर में गर फिसल,हाथ तुम मांगो अगर,
सोच मत, कोई ना बोलेगा के “उठ मैं हूं यहीं “,
देख लेंगे, हंस कहेंगे,” देख कर चलता नहीं? “
यही दुनिया की हकीकत यही सबके साथ होता,
भीड़ है हर सूं यहां पर, कोई अपना भी तो होता!

सुलेखा चटर्जी

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