
टूटा बहुत इस जिन्दगी से खता की तलाश है
समझ से अब भी परे हूँ समझनेवाले की बस आस है
हर मुमकिन सलाह आयीं जीवन जैसे वो समझ गये
नैया पार तो ना हुई हर तरह से बस हम ही भटक गये
बहुतों ने बहुत कुछ समझाया बहुत सी राहों पर चलाया
मुकाम हासिल ना हुआ भ्रम ने ही बहुत भरमाया
दावा तो जीवन को समझने हरेक का था गुत्थी को सुलझा कौन पाया
अनसुलझी खुद की डोर को छोड़ ज्ञान हमे ही दे आया
आधुनिकता के इस दौर मे जन्म मरण आज भी अनसुलझा एक रहस्य ही है
पौथी पुराण विज्ञान की परीधी बस जीवन के आगे मूक दृश्य है
कहाँ से आये कहाँ को गये आज भी इस सत्य से अनजान है
जीवन का ज्ञान देनेवाले महापुरुष भी इस तथ्य पर मूक जबान है
संसार एक कर्मलोक है कर्म और ईश भक्ति ही जीवन का व्यापक आधार है
कर्म और भक्ति से विमुख छदम ज्ञानियों का सम्पूर्ण जीवन बंटाधार है
अपनी त्रुटियों से परे समकक्ष की त्रुटियां निकालना ही एक असाध्य रोग है
आत्मकेन्द्रित कर्म और विचारों पर संतुलन बनाये रखना ही सफल जीवन का योग है
संदीप सक्सेना
जबलपुर म प्र












