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दादा पोती

दादा पोती का प्यार देखो ,
दादा का यह दुलार देखो ,
नन्हीं सी है मासूम बच्ची ,
नन्हीं पे स्नेह अपार देखो ।
पोते पोती प्राण से प्यारा ,
पोते पोती से दादा हारा ,
पोती के स्नेह में पागल ,
पोती है ऑंखों का तारा ।
पोती संग है दौड़ लगाना ,
अपने हाथों ही खिलाना ,
निज बचपन की याद में ,
स्वयं में ही है खो जाना ।
मस्तिष्क घूमे दृश्य निज ,
समझे बचपन क्या चीज ,
खेल खेल बचपन खोया ,
बारी अब अंकुरित बीज ।

पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )
बिहार ।

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