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जिल्लत और कर्ज रब का

उधार की जिन्दगी है जरूर मेरे मालिक उधार लूंगा नहीं तुम्हारे किसी बन्दे से
जिन्दगी उधार भी तुम्ही ने दी है मेरे आका उधार भी मूंह उठाकर लूंगा तुम्ही से नहीं तुम्हारे किसी बन्दे से

जिल्लत भी आखिर कुछ है जो सीधा तीर के माफिक दिल मे चुभता है
अहसानों तले जिन्दगी जीनेवाला पल पल हर पल ही मरता है

मौका भी ये तुम्ही दोगे जीने का सलिका भी तुम्ही दोगे
अहसान किसका मानूँ ये निहायत ही तमीज़ भी तुम्ही दोगे

मजबूर भी तुने किया ए मेरे रब खुदा मैं किसे मानूँ
पेट और ज़िस्म को या फिर रूह को अपना मानूँ

दर्द मे तुने कोई कमी नहीं की दवा देना क्यों भुल गया
अभी समय नही तो फिर समय क्या तू भी भुल गया

सब खोके जी रहे है जैसे पैदा हुए वैसे ही जी रहे है
था कुछ नही मेरे पास ए मेरे मौला फिर जमीर ही क्यों छीन रहे है

हाथ ही नही फैलाये थे ज़िन्दा तो हम वैसे ही थे
फिर जिन्दगी गुलाम क्यों किये जा रहे है

दर्द तुने तबियत से खूब दिया हमने भी सब निगल लिया
अब अदावियत पर ही अपनी बेरुखी क्यों दिखाये जा रहे है

हर ज़ुल्म तेरा ए रब सर आंखों लूंगा जिल्लत बेचारगी से महफूज करना
ये हाथ वापस ले लेना जिस दिन तेरे आगे से किसी ओर के सामने फैले हो

दर्द है दवा नही है प्यार से लड़ने का हौंसला दे तू भी कहीं नही है
झूठी इज़्ज़त को क्या करुँ रखकर जब साथ तेरा मुझे मयस्सर ही नहीं है

तन्हाई को रब बैचनी को नियती मान लेता हूँ
जीवन जीने की वजह कुछ नही आने का कर्ज मान लेता हूँ

किसी जनम की कोई रंजिश तुमसे थी ए मालिक
इस जनम चुका रहा हूँ
मरा अभी मैं नहीं हाँ किस्तोँ मे जरूर मरा जा रहा हूँ

सूद तुम्हारा बहुत भारी है लगता है जनम जायेगा चुकाने मे
दुबारा जनम ना चाहूंगा वास्ते तुम्हारा कर्ज़दार चाहने मे

स्वरचित एवं मौलिक
संदीप सक्सेना
जबलपुर म प्र

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