
पूरब से झाँके लालिमा हल्की,
ओस में भीगी धरती मुस्काए,
टन-टन करती बैलों की घंटी,
जैसे भोर स्वयं गुनगुनाए।
पेड़ों पर बैठी चिड़ियाँ सारी,
चहक-चहक कर गीत सुनाएँ,
गौरेया, मैना, कोयल मिलकर
नए दिवस का राग सजाएँ।
आँगन-आँगन झाड़ू की धुन,
चूल्हों से उठता धुआँ सलोना,
रोटी की सोंधी खुशबू में
महके हर घर-आँगन का कोना।
लाठी कंधे, सिर पर पगड़ी,
किसान चले खेतों की राह,
मिट्टी पलटे, सपने बोए,
मेहनत ही उसका सच्चा चाह।
पसीने की हर एक बूँद में
आशा का उजियारा है,
धरती माँ की गोद में पलता
उसका सारा सहारा है।
शाम ढले जब सूरज सोए,
गाँव फिर रंग बदलता है,
चौपालों पर किस्से खिलते,
बचपन गलियों में चलता है।
सादा जीवन, गहरी खुशियाँ,
अपनापन हर श्वास में,
गाँव की धड़कन बसती जैसे
प्रकृति के विश्वास में।
आर एस लॉस्टम











