
जीवन को जीने का सम्यक ज्ञान जो दें वो हैं महावीर,
भवसागर में डूबते प्रणी(प्राणी)को तारते हैं जो हैं महावीर,
तुम भी मुझ जैसे भगवान बन सकते हो जो बतलाते,
हर कण में भगवत्ता, शक्ति का, दर्श कराते सो हैं महावीर !
देख दूसरों की पीड़ा को नयनों से जिनके बहते नीर,
स्व और पर को पीड़ा से बचाने सदा रहते गंभीर,
करूणा,मैत्री सभी के प्रति, प्रेम ह्रदय में, रहे जिनके,
संवेदनशीलता के जीते जागते परम रूप बनते महावीर!
अध्यात्म ज्ञान की ज्योति जला जो अज्ञान तिमिर को सदा हरते,
राग, द्वेष और मोह को तज जो वीतराग पथ पर चलते,
अंतस बाह्य संरूप(समरूप )निश्छल, है पवित्र जिनका जीवन,
तीर्थ सा पावन तन मन जिनका स्वयं वो तीर्थंकर बनते!
कठिन समय में अटल बने संयम धारे वो धीर है,
कर्म शत्रु के प्रबल वेग पर विजय पाले वो वीर है,
विषय वासना और कषाय की जिस पर तनिक ना हो छाया,
निर्विकार बन रहे दिगंबर वो सच्चा महावीर है!
मूल अहिंसा के चहुंओर पंचशील सिद्धांत देते महावीर,
सत्य अपरिग्रह ब्रम्ह रूप जीवन सार्थक कहते महावीर,
इंद्रिय और मन पर विजय कर बन जाओ तुम स्वयं जिनेन्द्र,
चलकर प्रथम मोक्ष के मार्ग को, हैं प्रशस्त करते महावीर!!
तप संयम और त्याग साधना से मनुष्य भव सफल करो,
दस धर्मों को आत्मसात कर अंतर्चेतन उज्जवल करो,
सूत्र “जियो और जीने दो”, का ह्रदय में गुंजित रहे सदा,
महावीर के अनुगामी बन, यात्रा मुक्ति की अचल करो!
मन से ताना बाना हिंसा का टूटे हो जीवन उत्कर्ष ,
इच्छा और अनिच्छा तजना, यही अपरिग्रह सारांश,
सब असत्य सत से जीतो, दान से कृपणता जीतो,
क्रोध अहम लालच षड्यंत्र का लेश मात्र ना रखो अंतस !
युद्ध की बलि वेदी पर जब जब आहूति दी जाती है,
जाति, धर्म के नाम पे हिंसा से धरती थर्राती है,
मूक पशु की चीखें भी मानव मन को ना कम्पाए,
सच कहता हूं वीर तुम्हारी कमी बहुत ही सताती है !!
विरेन्द्र जैन “माहिर”
वड़ोदरा गुजरात











