
दिग दिगंत में भूमंडल पर
धू धू करती इस धरती पर।
प्रेम शांति करुणा स्नेह का
नामो निशान नहीं मिलता।
त्राहि त्राहि करती मानवता
चितकार उठी चहुं दिश दानवता,,
कटुता,क्लेश ,संघर्ष रत दीनों को,,
निशकंटक जीना नहीं मिलता।।
जल ,थल ,नभ, शोलो से पीड़ित,,
भूकंपीत ,तांडव से तापित,
सदा मौत से कं पित जीवो को,,,
जीवन का आश्रय नहीं मिलता,,
अब भी,,,,
होना क्या है ,,समय गर्भ में
कोई नहीं कुछ कह सकता,
इस अनिश्चय में निर्भय का
कोई काल नहीं मिलता,,।।
अभी चाहे तो मानव,,
छोडअपने गुरूर को,,,,
सच्चा जीवन जी सकता है
विश्व शांति और मानवता का,,
सन्मार्ग पड़ सकता है,।।
सत पुरुषों की वाणी का
आधार तरा सकता है,,
महा प्रलय के इस तांडव से
अरे भाई,,
मानवता को,,,
अभी तो ,,बचाया सकता है,,,
,,,, एक सद्विचार। ।
राजेंद्र कुमार तिवारी मंदसौर ,मध्य प्रदेश










