
‘ ध्यान एक ऐसी विधा है, जो भूले हुये कार्य की याद दिला देती है ।।
जो भी ब्यक्ति किसी भी {मंत्र} वाक्य को बार-बार दुहराये तो उसमें कंपन आरम्भ होकर, ऊर्जा बनकर एक चुम्बकीय आभा शरीर के चारो लहराने लगता है ।।
जप हम करते हैं मंत्रों का ।।
ध्यान करते हैं सविता का ।।
तथा…………….
ऐसे समय अवचेतन हमारे मन: स्थिति मे,
जो अति आवश्यक कार्य होते हैं
उनकी याद दिला देते हैं
।।रूद्राक्ष धारण करने वाले अवश्य पढ़ें ।।
{रूद्राक्षजाबालोपनिषद्}
“मद्यं मांसं न लशुनं पलाण्डुं शिग्रुमेव च ।
श्लेष्मातकं विड्वराहम् भक्ष्यं वर्जयेन्नरः ।।
ग्रहणे विषुवे चैवमयने संक्रमेऽपि च ।
दर्शेषु पूर्णमासे च पूर्णेषु दिवसेषु च ।।
रुद्राक्ष धारण करने वालों को,
मद्य मांस -लहसुन – प्याज – शिग्रु {कुकुरमुत्ता जैसे पदार्थ}
लिसोडा – विड्वराह – आदि अभक्ष्य पदार्थों को छोड़ देना चाहिए ।।
सूर्य – चन्द्र के ग्रहण के समय में – अमावस्या – पूर्णमासी –
उत्तरायण – दक्षिणायण योग,
तुला – मेषादि की संक्राति के समय, दिन – रात की बराबरी के समय में रूद्राक्ष धारण किये जाने पर मनुष्य सभी पापों से शीघ्र ही छुटकारा पा लेता है ।।
रूद्रस्य नयनादुत्पन्ना रूद्राक्ष इति लोके ख्यायन्ते ।।
लोक में प्रसिद्ध है कि रुद्र की आँख से रूद्राक्ष उत्पन्न हुए हैं ।।
” तद्रुद्राक्षे वागिविषये कृते दशगोप्रदानेन यत्फलमवाप्नोति तत्फलमश्नुते ।।
रूद्राक्ष का केवल नाम उच्चारण करने से जो फल दस गायों के दान से मिलता है उतना फल मिल जाता है ।।
रूद्राक्षमूलं तद्ब्रह्म तन्नालं विष्णुरेव च ।
तन्मुखं रूद्र इत्याहुतदूबिन्दुः सर्वदेवताः ।।
इस रूद्राक्ष के मूल में ब्रह्मा – नाल वाले भाग में विष्णु – तथा मुख में अर्थात् उसमें पडी हुई रेखाओं में रूद्र {शिव} तथा उसके बिन्दुओं में सभी देवताओं का निवास स्थान है।।
साधना मे उतरकर तो देखें ।।
केवल ४० दिन ।।
हरिकृपा ।।
मंगल कामना ।।
*ध्यान और जप करें*
आप हम जिस पैसे के लिए बहुत दौड़ रहे,
उसका सूत्र है ध्यान और जप ।।
आप अवश्य एक बार
यह प्रयोग करें
*हरिकृपा ।।
।। मंगल कामना ।।
निवेदक-- {साधक} बलराम शुक्ल










