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आँसुओं की नदी में मुस्कानों की धार बहा

जब दिल पर चुपके दर्द का साया छाया,
हर सपना जैसे टूटकर बिखर गया।
आँखों में भर आई खामोशी की नमी,
मैं भी जैसे कहीं खुद में खो गया॥1॥

अपने भी जब दूर से लगने लगे सब,
राहों में जैसे अंधेरा ही अंधेरा था।
तभी भीतर से एक हल्की आवाज उठी—
“आँसुओं की नदी में मुस्कानों की धार बहा”॥2॥

मत हार तू इन हालातों के आगे,
हर दुःख के पीछे कोई सीख छुपी है।
जो हँसकर दर्द को अपना लेता है,
उसी की राह में खुशियों की धूप बिछी है॥3॥

रात कितनी भी लंबी क्यों न हो जाए,
सुबह का उजाला जरूर आता है।
थाम ले उम्मीद का छोटा सा दीप,
यही जीवन को आगे बढ़ाता है॥4॥

अब, अपने आँसू मोती जैसे सजा ले,
हर पीड़ा को अपनी ताकत बना ले।
इस छोटी सी जीवन-राह में मुस्काकर,
मुस्कान को ही सच्चा सहारा बना ले॥5॥

योगेश गहतोड़ी “यश”

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