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उच्छल-तरंग

कर्मठता पूर्ण श्रम, भाग्य चले निभे कर्म।
कर्मफल मिले न मिले भूल न स्व धर्म।

अनादि-अनंत जग रचे जीवात्मा है अंश।
ये जग भव सागर, जीव तो उच्छल तरंग।

तरंग का न अस्तित्व,बहे भवसागर संग।
जीवात्मा बहे उसके रंग जिस के नवरंग।

ये जग उसकी रचना हम रंगे उसी के रंग।
मानव क्यूं पाल बैठा’मैं ‘भावना का दंभ।

नाभी में तेरे सुगंध तूं दौड़ रहा बन कुरंग।
बाहुबली चिंघाड़े ज्यूं नश्वर वन में मातंग।

क्या तूं लेकर आया था क्या जाएगा संग।
उसकी सृष्टि दंभ क्यूं ,नष्ट हो तूं ज्यूं भृंग‌।

जग-जीव वो समाया,दंभी लेवे झूठे प्रण।
आत्माओं से क्रीड़ा कैसी,जंजीर बंधे यम।

ऊपर बैठा वो देखे, जीव होगा तूं बेदम।
असत्य व्यवहार व वायदे तेरे नीच कर्म।

उस की सृष्टि में पाप-पुण्य निभे तेरा धर्म।
ढोंग रचे जग तूं खेला, लौटेगा तेरा विधर्म।

महेश शर्मा, करनाल

महेश शर्मा 1329 सैक्टर-6 (अर्बन एस्टेट,करनाल)

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