
उसकी आँखों में अक्सर मैं खोजता हूँ
एक अधूरा-सा ख़्वाब,
जो कभी मेरे नाम से शुरू हुआ था
और ख़ामोशी पर आकर ठहर गया।
उन गहरी पुतलियों के भीतर
जैसे कोई समंदर छिपा हो
ऊपर से बिल्कुल शांत,
भीतर लहरों का अनकहा शोर।
मैं जब भी झांकता हूँ उनमें,
अपना ही अक्स पाता हूँ
थोड़ा टूटा हुआ,
थोड़ा उम्मीद से भरा हुआ।
वो कुछ कहती नहीं,
पर बहुत कुछ कह जाती हैं आँखें,
जैसे शाम ढलते ही
आसमान रंग बदल कर
अपना हाल सुना देता है।
कभी उनमें चमक दिखती है,
तो दिल यक़ीन करने लगता है
कि अभी भी कहीं
मेरे नाम की एक लौ जलती है।
और कभी वही आँखें
इतनी दूर लगती हैं
कि जैसे सदियों का फ़ासला
एक पल में उतर आया हो।
फिर भी—
उसकी आँखों में अक्सर मैं खोजता हूँ,
क्योंकि शायद
मेरी मोहब्बत का आख़िरी पता
अब भी वहीं लिखा है।
आर एस लॉस्टम











