
तन-मन की गहराई में उठती सूक्ष्म विकार की धार,
मान, काम, क्रोध सहित लोभ-मोह बनें जीवन-भार।
चित्त-भूमि पर छाया बनकर भीतर घर कर जाते हैं,
पंचविकार कहे जाते ये, आत्म-प्रकाश ढँक देते हैं॥
जब “मैं” का अभिमान हृदय में ऊँचा उठने लगता है,
तब मान-अहं का सूक्ष्म विष भीतर भरने लगता है।
विनय-वृक्ष की कोमल डाली धीरे-धीरे झुक जाती है,
शांति-सरोवर की निर्मल धारा क्षीण होती जाती है॥
जब काम तरंगित इच्छा बन मर्यादा सब तोड़ता है,
अतृप्ति-अग्नि बन जीवन-वन भीतर-भीतर जलता है।
भोग मिले कितने भी फिर भी तृप्ति नहीं आ पाती है,
संतुलन का कोमल धागा पल में टूट-सा जाता है॥
क्रोध ज्वाला बन चेतन को क्षण भर में भरमाता है,
कटु-वचन का तीक्ष्ण प्रहार संबंध झुलसा जाता है।
तब आवेगों की तीव्र लहर में बुद्धि मौन हो जाती है,
विवेक की शीतल छाया भी दूर कहीं खो जाती है॥
जब लोभ अनंत पिपासा बन मन को दौड़ाता है,
संचय-सर्प संतोष-सुधा चुपके से पी जाता है।
धन-पद-यश होते भी सुख का फल नहीं दे पाते हैं,
रिक्त हृदय की गूँज अंतर्मन में ही रह जाती है॥
मोह ममता का जाल बुनकर चेतन को बाँध लेता है,
“मेरा-तेरा” का सूक्ष्म तंतु सत्य ढँक देता है।
अंतर-बोध की स्वच्छ किरण धूमिल-सी हो जाती है,
आत्म-प्रकाश की निर्मल धारा रुक-सी जाती है॥
यदि मान विनय में ढल जाए तो आत्मबल बढ़ जाता,
काम शुद्ध संकल्प बने तो सृजन-पथ सज जाता।
क्रोध धर्म-तेज बन जाए तब अन्याय स्वयं झुकता,
लोभ परिमित पुरुषार्थ बने जीवन सफल दिखता॥
मोह करुणा में रूपांतरित हो सेवा-पथ दिखलाता है,
पंचविकार ही पंचदीप बन इस जीवन को जगमगाता है।
जब साक्षी-भाव स्थिर हो जाए, अंतर निर्मल हो जाता है,
तब जीव-ब्रह्म एकत्व प्रकटे, मुक्ति-द्वार खुल जाता है॥
योगेश गहतोड़ी “यश”











