
रंगों में ख़ुशबू भी होती है,
चुपचाप गुफ़्तगू भी होती है।
जो आँखें सुनना जानती हैं,
उनके लिए हर छाया रू-ब-रू होती है।
लाल में धड़कनों की गर्मी,
नीले में गहराई का राज़,
पीला जैसे उम्मीद की धूप,
हरा जैसे लौटती हुई आवाज़।
सफेद में सुकून का आँगन,
काला जैसे रात का आलिंगन,
हर रंग अपने भीतर
एक पूरा जीवन रखता है गुमसुम।
हम समझते हैं रंग बस दिखते हैं,
पर वो महकते भी हैं भीतर कहीं—
जैसे यादों की अलमारी में
पुरानी चिट्ठियाँ रखी हों यहीं।
रंगों में ख़ुशबू भी होती है,
चुपचाप गुफ़्तगू भी होती है—
बस दिल अगर ठहर कर देखे,
तो हर खामोशी में
एक कहानी शुरू होती है।
आर एस लॉस्टम











