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ऋतुराज बसंत और होली

महुआ फूलों से महक रही है 

आम्र मंजरिया झूल रही हैं ।

नव-सृजन, नव-कोंपल उभर रही हैं ।

कुहू-कुहू कोयल भी कुहुक रही है।

ऋतुराज बसंत की छटा निराली 

समां खुशनुमा चंहू ओर हरियाली ।

आया मस्ती भरा फागुन रंगीला 

सप्त रंगों से सजा अलबेला।

फूली सरसों, टेसू,पलास, मतवारे

होली हुड़दंग लिए आए होलियारे।

ढोलक, झांझ, मंजीरे की धुन भाए

गूंजे होली के गीत गांव गलियारे।

आया होली का त्योहार मनभावन 

रंगों में सराबोर डूबा है तन-मन ।

अस्पृश्यता का कोई नामो निशान नहीं 

सौहार्दता, एकता का रंग बिखरा हर कहीं।

                        उर्मिला  ढौंडियाल ‘उर्मि’ 

                         देहरादून (उत्तराखंड)

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