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चंचल मन

जीवन है पानी समान है
बहता रहता हर दिशा में
मन है यह मिट्टी समान
हर परिस्थित में आकार लेता।

सुख दुख सब समान सा है
क्षण भर के लिए पास में रहता
इस नश्वर देह का मोह ना कर प्राणी
पल भर में ये मिट्टी में मिल जाता।

रुपया पैसा से मोह है सबको
सबको अपनी स्वार्थ की पड़ी
अपनों ने अपनों को लुटा
लुटेरों की घर में ही टोली खड़ी।

मायाबी हैं कलियुग की दुनियां
माया के सब ढोंग रचाते
तू मेरा है, मैं तेरा हूं
झूठे माया की ढोल बजाते।

कांच सा कोमल सबका मन है
कांच सा कोमल सबका जीवन
अगर पड़ी झूठ की दरारें
बिखर जाते हैं रिश्तों का बंधन।

नदी की भांति बहते है हम
कच्चे मिट्टी की खुशबू भरे तन
ना जाने कब परिपक्व होंगे
या यूं ही कट जाएगा जीवन।

अनिता महेश पाणिग्राही
सरायपाली छत्तीसगढ़

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