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ख़्वाबों की परछाई


आजकल वो सपने में फिर से आने लगी हैं,
बनके फिर से इश्क़ की परछाई सताने लगी हैं।

जो दफ़्न कर दिए थे अरमान दिल की मिट्टी में,
वो चुपके-चुपके उन्हें फिर से जगाने लगी हैं।

मैंने समझा था कि अब ख़त्म हुआ किस्सा सब,
वो अधूरी दास्ताँ फिर से सुनाने लगी हैं।

रात की ख़ामोशी में धड़कनों की आहट बनकर,
मेरी तन्हाइयों को फिर से बहलाने लगी हैं।

भूल जाने की कसम खाई थी कई दफ़ा मैंने,
वो कसम तोड़ के यादों में बुलाने लगी हैं।

न कोई पैग़ाम, न आवाज़, न ही दस्तक कोई,
बस ख़्वाब बनके दिल का दरवाज़ा खटखटाने लगी हैं।

सुबह होती है तो लगता है सब धोखा था मगर,
शाम ढले फिर वही सूरत नज़र आने लगी हैं।
आर एस लॉस्टम

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