
आओ सुनाऊं सखी री, मेरी होली कैसी रही..?
पहली होली पड़ गई सासुरे में, दैया रे
मोर नटखट देवरा करे ठिठोली
कसके पकड़े नरम कलाई, दैया रे
मेरी पहली होली पड़ गई ससुरे में
देखी -देखी नन्द मोरी फरमाए
काहे को धूमा चौकड़ी मचाए दैया रे
भर भर पिचकारी भिंगाए चोली रे
कैसे कहूं अब कह लो ना जाए रे दैया रे
मोर सजनवा अंक भर के खेले होली रे
मन के बतिया भीतरे रह जाए रे
बड़ा मजा करे प्यार के रंग में दैया रे
अंगनवा में हमका खूब नचावे दैया रे
कोई बलजोरी कर पा के अकेले
कोई हमका खींचे कोई धकेले दैया रे
बारी-बारी रंग उमंग संग मिलके लगाए दैया रे
गालियों- चौराहों में देखो बाजे ढोल और मृदंग
लाल पीले हरे रंगों के संग खूब खेले होली
भांग की मस्ती हर घर -घर में
हर घर मंहके के खुशियों के संग
दैया रे
पहली होली पड़ गई सासुरे में
मैं मन- ही -मन मुस्काई
मैं वारी -वारी जाऊं, जो पहली होली
सासुरे में मनाई…. दैया रे
डॉ मीना कुमारी परिहार











