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फागुन की बहार: ब्रज की होली

जब फिज़ाओं में रंगों की ज़हमत हो, तब देख बहारें होली की,
बाज़ारों में जब रौनक छा जाए, तब देख बहारें होली की।

पतझड़ के बीते मौसम के बाद, जब खिलीं खुशियों की कलियाँ,
अबीर-गुलाल से महक उठीं, जब ब्रज की पावन गलियाँ।

वृंदावन की होली देखो, जहाँ कृष्ण संग राधिका रानी हैं,
आज हमें तुमको रंगना है, यह प्रीत बहुत पुरानी है।

फूलों का मैं रंग बनाकर, प्रेम की गागर लाया हूँ,
स्वीकार करो इन रंगों को, मैं तुम्हें नहलाने आया हूँ।

हाथों में लेकर पिचकारी, हम अंग-अंग भिगोएँगे,
आज दिलों की सारी दूरियाँ, रंगों में हम धोएँगे।

गुलाल तो बस एक बहाना है, असली इरादा मिलन का है,
मिटाकर सारी रंजिशें, उत्सव आज समर्पण का है।

कान्हा बोले— “बतलाओ राधे, कौन सी पिचकारी लेनी है?”
राधे बोली— “श्याम! प्रीत की परिभाषा क्या देनी है?

मैं तो पहले से ही तुम्हारे, श्याम रंग में रंगी हुई हूँ,
छोड़ के सारा जग ये सांवरे, बस तुम्हारी बनी हुई हूँ।”

श्यामल रंग में रंगी किशोरी, उड़ रहा गुलाल चहुं ओर है,
प्रेम के रंग में डूबा ब्रज, मचा हर तरफ शोर है।

बाज़ारों में रौनक छाई, खुशियों की चली टोली है,
ब्रज की पावन धरती पर, देखो आज होली है!

कवयित्री ज्योती वर्णवाल
नवादा (बिहार)

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