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बचपन की होली

एक होली का त्यौहार था
चारों ओर रंगों का प्यार था

रंग अबीर गुलाल से ही होता था सत्कार
गुजिया पेड़े मठरी चूड़ा खान पान का था बहार

पिचकारी पानी घेरु मिट्टी ही होली के निशान थे
गोबर के बल्लों से बनी माला ही पूजन के समान थे

होली मे गुलाल का मिलन ही अपनत्व का रिवाज था
प्रेम सौहार्द से सराबोर गले मिलना ही समृद्ध समाज था

मशीनी युग में त्यौहार भी मशीनी हो गये
भावनायें उत्साह सब भागते समय की बली चढ़ गये

प्यार भावनाओं के अभाव मे त्यौहार अब छुट से गये है
बदलते इस दौर मे स्वार्थता की आंधी मे रीति रिवाज परम्पराएं भी टूट से गये है


संदीप सक्सेना
जबलपुर म प्र

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