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तंमंजये


अध्याय– 1
एक दिन प्रातःकाल, जब महल अभी निद्रा से पूरी तरह जागा भी न था, तंमंजये अपने माता–पिता के शयनकक्ष में प्रवेश करता है। उसके चेहरे पर बालसुलभ चंचलता नहीं, बल्कि एक असमय गंभीरता थी।
वह दोनों के सम्मुख नतमस्तक होकर खड़ा हुआ और शांत किंतु दृढ़ स्वर में बोला—
“पिता श्री… माता श्री… मैं आपसे आज्ञा लेने आया हूँ।”
महाराज रुपरांजये यह सुनकर चौंक उठे। सात वर्ष का एक बालक—राजपाट, वैभव, माता–पिता और समस्त सुख-सुविधाएँ छोड़ने की बात कर रहा था। यह सुनना ही कठिन था, समझ पाना तो और भी।
महाराज के मन में प्रश्नों का तूफान उठ खड़ा हुआ—
ऐसी कौन-सी पीड़ा है जो मेरे इतने छोटे पुत्र को यह कठोर निर्णय लेने पर विवश कर रही है?
महाराज दुःखी भी थे और आश्चर्यचकित भी।
तभी तंमंजये बोला—
तंमंजये (दबी हुई पीड़ा के साथ) –
“पिता श्री, मैं अनुमति चाहता हूँ।”
महाराज (चकित स्वर में) –
“अनुमति? किस बात की, पुत्र?”
तंमंजये –
“प्रणाम पिता श्री।”
महाराज –
“आयुष्मान भव, पुत्र।”
तंमंजये –
“पिता श्री, मैं मानसिक वेदना से गुजर रहा हूँ… मुझे प्रताड़ित किया जा रहा है।”
यह सुनकर महाराज चौंक गए।
महाराज –
“कौन प्रताड़ित कर रहा है तुम्हें, पुत्र?”
तंमंजये –
“माता श्री… और आप, पिता श्री।”
महाराज (अचंभित) –
“क्या? माता श्री?”
तंमंजये –
“जी, पिता श्री।”
महाराज –
“कैसी प्रताड़ना, पुत्र?”
तंमंजये –
“मुझे मेरी इच्छा के विरुद्ध गुरुकुल भेजा जा रहा है। शिक्षा के लिए बाध्य किया जा रहा है, जबकि मेरा मन वहाँ नहीं लगता।”
महाराज –
“पुत्र, यह सब तुम्हारे भविष्य के लिए किया जा रहा है।”
तंमंजये –
“लेकिन पिता श्री, मुझे उसमें कोई रुचि नहीं है।”
महाराज –
“तो तुम क्या चाहते हो, पुत्र?”
तंमंजये –
“या तो आप माता श्री को दंडित करें… या फिर मैं इस राज्य को छोड़कर कहीं दूर चला जाऊँ।”
महाराज कुछ क्षण मौन रहे। फिर एक गहरी साँस लेकर बोले—
महाराज –
“पुत्र, तुम्हारी माता से लड़ने की क्षमता मुझमें भी नहीं है। अतः तुम्हारे लिए राज्य छोड़कर जाना ही उचित होगा।”
तंमंजये –
“तो मैं आपके आदेश की प्रतीक्षा करूँगा, पिता श्री।”
महाराज के हृदय में हूक उठी, पर वे मौन रहे।
तंमंजये –
“प्रणाम पिता श्री। मैं प्रस्थान करता हूँ।”
महाराज –
“जाओ पुत्र… अपना ध्यान रखना। जहाँ भी रहो, अपना इतिहास स्वयं लिखना। मेरा आशीर्वाद सदा तुम्हारे साथ है।”

तंमंजये अब महारानी रीमवती के कक्ष की ओर बढ़ा।
कक्ष में प्रवेश करते ही वह चरण-स्पर्श करता है—
तंमंजये –
“प्रणाम माता श्री। मैं इस राज्य को सदा के लिए त्याग कर जा रहा हूँ।”
रीमवती (व्याकुल होकर) –
“क्या हुआ पुत्र? कहाँ जा रहे हो और क्यों?”
तंमंजये –
“माता श्री, आप तो मेरा उपहास कर रही हैं।”
रीमवती –
“उपहास? नहीं पुत्र।”
तंमंजये –
“यदि उपहास नहीं, तो और क्या? आपके कारण ही मैं समस्त सुख-सुविधाएँ छोड़ रहा हूँ।”
रीमवती –
“मेरे कारण? पुत्र, यह क्या कह रहे हो?”
तंमंजये –
“हाँ माता श्री, आपके किए गए अत्याचारों से पीड़ित होकर मैं यह निर्णय ले रहा हूँ।”
यह सुनकर रीमवती का हृदय काँप उठा।
रीमवती –
“पुत्र, मेरी ममता को कलंकित मत करो। मुझ पर ऐसा आरोप लगाकर मुझे जीवनभर अपराधबोध में मत डालो। स्पष्ट बताओ—क्या हुआ है?”
तंमंजये –
“यदि आपने मुझे गुरुकुल जाने को बाध्य न किया होता, तो मुझे यह निर्णय नहीं लेना पड़ता।”
रीमवती –
“पुत्र, मैंने वही किया जो तुम्हारे भविष्य के लिए उचित था।”
तंमंजये –
“पर मुझे शिक्षा और गुरुकुल—दोनों में रुचि नहीं है।”
रीमवती (आँखें भरते हुए) –
“फिर भी मैं चाहूँगी कि तुम अपने निर्णय पर पुनः विचार करो।”
तंमंजये –
“माता श्री, मेरा निर्णय अटल है।”
रीमवती (संयत स्वर में) –
“तो जाओ पुत्र… अपना ध्यान रखना। यदि यही तुम्हें उचित लगता है, तो ईश्वर तुम्हारी रक्षा करें।”
तंमंजये –
“प्रणाम माता श्री।”
रीमवती –
“आयुष्मान भव, पुत्र।”

अब तंमंजये अपने बड़े भाई त्रयाश्रये के पास पहुँचा।
तंमंजये –
“प्रणाम भ्राता श्री।”
त्रयाश्रये –
“आयुष्मान अनुज। क्या कहीं यात्रा पर जा रहे हो?”
तंमंजये –
“नहीं भ्राता श्री। मैं इस राजपाट को सदा के लिए छोड़ रहा हूँ।”
त्रयाश्रये (स्तब्ध होकर) –
“क्यों अनुज? ऐसा कठोर निर्णय क्यों?”
तंमंजये –
“कोई विशेष कारण नहीं।”
त्रयाश्रये –
“फिर भी?”
तंमंजये –
“मैं आपसे विनती करता हूँ—माता-पिता का ध्यान रखना। आने वाले समय में इस राज्य का भार केवल आपके कंधों पर होगा।”
त्रयाश्रये –
“क्या तुम फिर कभी नहीं लौटोगे, अनुज?”
तंमंजये मौन रहा।

अंततः वह पुनः महाराज के कक्ष में पहुँचा।
तंमंजये –
“प्रणाम महाराज।”
महाराज –
“पुत्र, मुझे ‘महाराज’ क्यों कह रहे हो?”
तंमंजये –
“क्योंकि आज से मैं इस राज्य का केवल एक प्रजा हूँ।”
महाराज –
“पुत्र, क्या तुम अपना निर्णय नहीं बदल सकते?”
तंमंजये –
“नहीं महाराज। मैं एक क्षत्रिय हूँ। अब मेरा यहाँ रुकना उचित नहीं।”
और यह कहकर तंमंजये तिकडमगढ़ को त्याग देता है।

कुछ दिन बाद…
भारत की उत्तरी दिशा में स्थित था खंखड़ा विजुवन, जो आज के भारत–बांग्लादेश की सीमा को स्पर्श करता है। इस वन का स्वघोषित राजा था—आदमखोर शेर।
वह अत्यंत क्रूर, निर्दयी और रक्तपिपासु था। निर्बल प्राणियों को सताना और मार डालना उसका स्वभाव बन चुका था। उसी वन से सटा था विशाल मैंग्रोव वन—आज का सुंदरवन—जहाँ ऋषि भंगुमन का आश्रम स्थित था।
आदमखोर शेर का आतंक इतना व्यापक था कि उसका नाम सुनते ही वन के जीव काँप उठते थे।
एक दिन आदमखोर शेर के यहाँ एक पुत्र का जन्म हुआ—धूर्त शेर।
कहते हैं, दानव के घर भी कभी-कभी संत जन्म लेते हैं।
धूर्त शेर बड़ा हुआ और सही–गलत समझने लगा। वह अपने पिता को समझाने का प्रयास करता—
धूर्त शेर –
“पिता श्री, आप इस वन के राजा हैं। जिन प्राणियों को आप मारते हैं, वे आपकी प्रजा हैं।”
आदमखोर शेर –
“मुझे उपदेश मत दो!”
धूर्त शेर –
“मैं उपदेश नहीं, विवेक की बात कर रहा हूँ।”
आदमखोर शेर –
“मुझे यह सब करके आनंद मिलता है!”
धूर्त शेर –
“क्या अपने आनंद के लिए दूसरों की जान लेना न्याय है?”
आदमखोर शेर –
“यदि मैं शिकार न करूँ तो क्या खाऊँ?”
धूर्त शेर –
“कंद-मूल भी भोजन हैं, पिता श्री।”
आदमखोर शेर –
“मैं शेर हूँ! मांस खाना मेरा अधिकार है!”
धूर्त शेर –
“जैसी आपकी आज्ञा, पिता श्री।”
और धूर्त शेर वहाँ से चला गया—अपने पिता से अलग, किंतु अपने धर्म के साथ।

आर एस लॉस्टम

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