
गाँव के आखिरी छोर पर एक छोटा-सा घर था। मिट्टी की दीवारें, खपरैल की छत, और आँगन में एक पुराना अमरूद का पेड़। उसी घर में रहती थी राधा। उम्र 22 साल, आँखों में डॉक्टर बनने का ख़्वाब और हाथों में मेहँदी की कटोरियाँ।
राधा का बापू किसान था। दो बीघा ज़मीन, जो हर साल सूखे से अक्सर झुलस जाती थी। माँ दूसरों के घर चौका-बरतन किया करती थी। पर राधा ने 12वीं में पूरे जिले में टॉप किया था। मास्टर जी कहते—“बेटी, तू डॉक्टर बनेगी तो गाँव का नाम रोशन होगा।” राधा NEET की तैयारी के लिए शहर जाना चाहती थी। परंंतु कोचिंग की फीस थी 80 हज़ार रूपयै सालाना।
उसी साल छोटी बहन मीरा की शादी तय हो गई। लड़का रेलवे में था, दहेज में मोटरसाइकिल माँग रहा था। बापू ने खेत गिरवी रख दिया। माँ ने अपने कानों के झुमके बेच दिए। राधा चुपचाप देखती रही। जिस दिन मीरा डोली में बैठी, राधा ने अपनी किताबें संदूक में बंद कर दीं। बापू की आँखों में शर्म थी, पर राधा की आँखों में समझदारी थी। राधा ने अपने गाँव के एक स्कूल में 3000 रुपये महीने पर पढ़ाना शुरू किया। सुबह स्कूल, शाम को सिलाई, रात को बच्चों को ट्यूशन। जो पैसे जुड़ते, वो घर के राशन और बापू की दवाई में लग जाते। तीन साल यूं ही निकल गए। NEET की उम्र निकल गई, पर राधा ने उफ़ न की।
इसी बीच गाँव में मोबाइल टावर लगा। राधा ने यूट्यूब पर बच्चों को साइंस पढ़ाना शुरू किया। ‘राधा दीदी का साइंस’ चैनल धीरे-धीरे चल पड़ा। 50 बच्चे, 500 बच्चे, फिर 5000 बच्चे जुड़ गए। कमेंट आते—“दीदी, आपकी वजह से मेरा कॉन्सेप्ट क्लियर हुआ।” “दीदी, मैं भी गाँव से हूँ, डॉक्टर बनूँगा।”
पाँच साल बाद। मीरा दो बच्चों की माँ थी, सुखी थी। बापू का इलाज चल रहा था। और राधा? उसकी उम्र 27 हो चुकी थी। एक दिन गाँव में हेल्थ-कैंप लगा। शहर से डॉक्टरों की टीम आई। उनमें डॉ. अर्जुन था—राधा का स्कूल का दोस्त। अर्जुन अब बड़ा सर्जन था। उसने राधा को देखा, चौंक गया।
“तू तो NEET की टॉपर थी राधा, यहाँ क्या कर रही है?”
राधा मुस्कुराई। आँगन के अमरूद के पेड़ की तरफ इशारा किया। “वो देख, अर्जुन। ये पेड़ मैंने 10 साल पहले लगाया था। सोचती थी इसके अमरूद बेचकर कोचिंग की फीस दूँगी। पेड़ बड़ा हुआ, पर सूखा पड़ गया। फल नहीं आए।” अर्जुन चुप रहा। राधा ने आगे कहा—“मेरा स्टेथोस्कोप वाला ख़्वाब अधूरा रह गया। पर कल मेरे पढ़ाए हुए 3 बच्चे NEET निकाल गए। एक लड़की का फोन आया—‘दीदी, मैं आपके जैसी बनूँगी।’ उस वक्त लगा, शायद मेरा ख़्वाब मरा नहीं, बस रूप बदल लिया है।” अर्जुन ने राधा का यूट्यूब चैनल देखा। 2 लाख सब्सक्राइबर। कमेंट में सैकड़ों बच्चे—“थैंक्यू दीदी।” अर्जुन की आँखें भर आईं। बोला—“राधा, तू डॉक्टर नहीं बनी, पर तूने सैकड़ों डॉक्टर बना दिए।”
उस रात राधा छत पर लेटी तारे गिन रही थी। बापू खाँसते हुए आए। “बेटी, माफ कर दे। तेरी शादी की उम्र निकल रही है।” राधा ने बापू का हाथ पकड़ा। “बापू, इस जहाँ में सब को सबकुछ नहीं मिलता। मुझे सफेद कोट नहीं मिला, पर हज़ारों बच्चों की दुआएँ मिलीं। मेरा ख़्वाब अधूरा रहा, पर यूं बेकार नहीं गया।”
अगली सुबह राधा फिर स्कूल गई। ब्लैकबोर्ड पर लिखा—“आज का टॉपिक: दिल कैसे धड़कता है।” बच्चे हँस पड़े। राधा की आँखें भीग गईं, पर होंठों पर वही मुस्कान थी जो सिर्फ उन लोगों के पास होती है जिन्होंने अपने अधूरे ख़्वाबों से दूसरों के ख़्वाब पूरे करना सीख लिया हो।
निष्कर्षः सीख- ज़िंदगी हर ख़्वाब पूरा नहीं करती। पर टूटे ख़्वाबों के टुकड़ों से अगर किसी और का आसमान रौशन कर दो, तो ख़्वाब अधूरा रहकर भी मुकम्मल लगता है। क्योंकि आखिर में ‘पाना’ नहीं, ‘दे पाना’ मायने रखता है।
मुन्ना राम मेघवाल ।
कोलिया,डीडवाना,राजस्थान।













