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६. आज्ञा चक्र

।। ६. आज्ञा चक्र ।।
Medullary Plexus

चक्र स्थान– दोनों भौंहों के बीच अर्थात् भृकुटि के मध्य ढाई इंच भीतर ।।

आकृति– श्वेत प्रकाश के दो पंखुड़ियों {दलों} वाले कमल के समान ।

रंग– सफेद ।

केन्द्र– सभी चक्रों का सामंजस्य एवं सन्तुलन करता है। भ्रूमध्य के अन्दर इड़ा, पिंगला औरी सुषुम्ना नाड़ियाँ मिलती हैं ।।

ध्यान– दो दल वाले कमल की कल्पना की जाती है ।।

संबंधित ग्रंथि– पीयूष ग्रंथि और पीनियल ग्रंथि दूर-श्रवण, दूरदर्शन तथा विचार संप्रेषण जैसी क्षमताओं को जाग्रत करती है ।।

मंत्र की व्याहति– ओ३म् भुवः ।

शक्ति का नाम– भुवः शक्ति ।

तत्त्व बीज– ओ३म् है ।

तत्त्व बीज गति– नाद है ।

लोक– तपः है ।

अधिपति देवता– शिव ।

यंत्र– लिंगाकार ।

तत्त्व बीज का वाहन– नाद ।
जिस पर लिंग देवता है ।।

☀चक्र पर ध्यान करने का फल– इस चक्र पर ध्यान से निम्न अंगों एवं ग्रंथियों की सक्रियता बढ़ती है ।।

१. पिट्यूटरी ग्लैंड ।

२. इंडोकाइन ग्लैड ।

३. मन ।

४. सभी चक्रों का राजा। इसको मास्टर चक्र अथवा आज्ञा चक्र कहा जाता है ।

५. संपूर्ण शरीर ।

६. बाई आँख और बायां कान इस चक्र से अधिक ऊर्जावान् हो सकते हैं, जबकि दाई आँख और दायां कान सहस्रार चक्र से अधिक प्रभावित हो सकता है ।

७. मूलधार चक्र को सक्रिय करने का सशक्त माध्यम ।

८. मस्तिष्क और नर्वस सिस्टम से इसका बहुत गहरा संबंध होता है ।

९. नाक और श्वसन क्रिया से संबंध होता है ।

१०. चेतना का प्रमुख द्वार है ।।

☀नोट– मूलाधार से इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना पृथक् पृथक् प्रवाहित होकर इस स्थान पर मिलती हैं, इसलिए इसे त्रिवेणी भी कहते हैं । यह आज्ञा चक्र, ज्ञाननेत्र, भ्रमरी गुहा, शिव नेत्र, दिव्य दृष्टि का यंत्र है । भिन्न-भिन्न चक्रों के ध्यान द्वारा जो फल प्राप्त होते हैं, वे सभी एकमात्र इस चक्र पर ध्यान करने से सहज में ही प्राप्त हो जाते हैं । आज्ञा चक्र में सिद्धहस्त हो जाने पर ही साधक को आगे सहस्रार में प्रवेश की योग्यता प्राप्त होती है। आज्ञा चक्र में इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना का विलय होता है । यहां पर द्वैत भाव की समाप्ति होने से इसको मुक्त त्रिवेणी भी कहा जाता है । त्राटक से आज्ञा चक्र को जाग्रत किया जाता है। रेकी की ऊर्जा भी आज्ञा चक्र से एवं हृदय चक्र से प्रसारित होती है तथा दोनों मिल कर लब्धक तक पहुँचती हैं ।।

चक्र के विकारग्रस्त होने से हानियाँ– आज्ञा चक्र के अस्वस्थ हो जाने अथवा क्रियाशीलता के अभाव में निम्न बीमारियाँ होने का भय रहता है ।

१. कैंसर ।

२. एलर्जी ।

३. दमा ।

४. आँख की बीमारियां ।

५. कान की बीमारियां ।

६. नाक की बीमारियां ।

७. मस्तिष्क सम्बन्धी विकार ।

८.कल्पना-शक्ति का ह्रास ।

९. एकाग्रचित्तत्ता का अभाव ।

१०. चंचलता का आधिक्य। स्त्रियों को आज्ञा चक्र पर ध्यान करना उचित नहीं माना गया है ।।
हरिकृपा ।।
संकलन व प्रेषण–
पं. बलराम शरण शुक्ल हरिद्वार ।।

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