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क्या कसूर था

हो रहा सरेआम कत्ल,…….
उन बेजुबान पेड़ों का…….
लुटा रहा है अस्तित्व ……,
धरती मां के प्यारो का…….
सूख रही है नदियां,…….
कट रहा है दामन हरियाली का……
बिक रहा है धरती मां का आंगन अब,……
नाम हो रहा विकास का…….
छाई थी हरियाली चारों ओर…….
,आज हुआ है कब्जा बड़ी बड़ी इमारतों का……
रोक लो इस संहार को ए इंसान ……
, वर्ना रह जाएगा पछतावा बस क़िस्मत का…….
क्या कुछ नहीं मिला इनसे हमें,……..
जीवन अर्पण किया इन्होंने बचपन से बुढ़ापे का…….
बाढ़, आंधी, तूफान में खड़ा रहा …….
बन पहरी धरती मां का सपूत सा…….
जीवित है सभी प्राणी इसके दम पर……..
खुद ही घोंट रहा है गला अपनी आने वाली पीढ़ी का….
क्या किया हमने फिर पूछेगा बच्चा बच्चा…….
इस मातृभूमि के प्रकृति सौंदर्य का……
गिर जाएंगे तब अपनी ही नज़रों में हम सब ,……
जब दोष देगा ना मिलेगा पेड़ हकीकत का……
रोएगा, चिल्ला कर कह उठेंगा एक दिन खुद ही पेड़…
जीवन अपना किया था अर्पण,……
यही कसूर था हम पेड़ों का ,……
क्या यही कसूर था हम पेड़ों का….. ??????

प्रिया काम्बोज प्रिया स
सहारनपुर उत्तर प्रदेश

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