
तन में धू धू आग धनके ,
जल बिन कौन बुझाए रे ।
जल ही तो जीवन होता ,
जल बिन जीवन जल जाए रे ।।
भरी जवानी अग्नि शोला ,
बम बारूद का जैसे गोला ।
जल ही जीवन को बचाता ,
जल बिन भस्म होता चोला ।।
जीते जी मर जाए मानव ,
अपना जल न बचाए रे ।
जल बिन तन में आग धनके ,
जल बिन कौन बुझाए रे ।।
जल ही है जीवों का जीवन ,
क्यूॅं सोचता न नादान है ।
जबतक जल मिले धरा पर ,
तबतक तन में प्राण है ।।
बहे नल बिन कारण कहीं ,
नाहक जल है गॅंवाए रे ।
जल बिन तन आग धनके ,
जल बिन कौन बुझाए रे ।।
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )
बिहार ।












